July 17, 2018
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Category: हिंदी

आख़िर किस ओर जा रहा है समाज? ‘धर्म की समझ’ न रखने वाले ही कर रहे धर्म के नाम पर ‘हिंसा’

हाल ही में आप अख़बार पढ़िए या न्यूज़ चैनल देखिये, हर कहीं आपको धर्म-जाति के नाम पर हो रही हिंसा कि ख़बरे आम होती नज़र आयेंगी | देश में बेरोजगारी, भूखमरी, किसानों कि बदहाल स्थिति जैसी समस्याओं कि कमी नहीं, लेकिन इसके बावजूद पूरा देश सिर्फ़ धर्म और जाति कि बहस करने और इसको लेकर […]

“धाँधली / पेपर लीक”: देश की परीक्षा व्यवस्था में जुड़ता एक ‘नया चरण’

देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की बात करें या अब बोर्ड परीक्षाओं की, लिखित और अन्य चरणों में कहीं न कहीं आज कल एक नया चरण जरुर देखने को मिल रहा है, और वह है, ‘पेपर लीक’, ‘धाँधली’ या ‘कोर्ट केस’ का चरण | इस नए चरण के बिना अब देश में कोई भी परीक्षा करवाना […]

जिस देश में ‘पत्रकारिता’ महफूज़ नहीं उसको लोकतांत्रिक कहना कितना उचित है?

कहते हैं, किसी भी सफ़ल लोकतंत्र की नींव बिना एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, भयमुक्त और ज़िम्मेदार मीडिया के नहीं रखी जा सकती है, और जब किसी देश का मीडिया को भी सरकारें और प्रशासन डराने और  धमकाने लगें, तो समझ जाइए, उस देश का लोकतांत्रिक अस्तित्व ख़तरे में हैं | कुछ ऐसा ही दौर शुरू हो […]

45 साल बाद फिर से देश में सुनाई देने लगी “चिपको” की गूंज: #ChipkoRe #SaveAarey

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार। मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार। ये वो पंक्तियाँ हैं, जिनकी गूंज 1973 में उत्तर प्रदेश के चमोली जिले से शुरू होकर, एक दशक के अन्दर पूरे उत्तराखण्ड क्षेत्र में भी सुनाई देने लगी थीं, और इन पंक्तियों का आधार था ‘चिपको आन्दोलन’ | दरसल भारत के उत्तराखण्ड राज्य […]

क़िरदार को निभाने नहीं, क़िरदार को ‘जीने’ वाले अदाकार: ‘फारुख शेख’

अगर आप उन भाग्यशाली लोगों में से एक हैं, जिन्होंने ‘चश्मे बद्दूर’ के किरदार सिद्धार्थ पराशर, ‘उमराव जान’ में नवाब कि भूमिका वाले किरदार और फिल्म ‘साथ-साथ’ के बेबस बेरोजगार युवक के क़िरदार को देखा है, तो शायद मुझे नहीं लगता आपको इन किरदारों को निभाने वाले शख्स ‘फारूख शेख’ की अदाकारी के बारे में कुछ […]

‘मानवता’ के काम आने में विफ़ल साबित हो रहीं हैं आज की ‘प्रतिभाएं’: प्रणब मुखर्जी

एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश में शिक्षा के मापदडों और उच्च शिक्षा के मायनों पर सवाल उठाया है | दरसल, प्रणब मुखर्जी ने कहा कि ” देश के तमाम क्षेत्रों में हर साल अनेकों प्रतिभाएं सामने आती हैं और लोग उनसे प्रभावित भी हो सकतें हैं, लेकिन इनमें से बहुत ही […]

‘विचारधारा’ को ताक़ में रख सिर्फ़ ‘वोटों की गणित’ तक सिमटी राजनीति

‘राजनीति’, कभी इस  शब्द के मायने विचारधाराओं के इर्द-गिर्द घूमा करते थे, लेकिन कुछ दशकों से देश में राजनीति का मलतब सिर्फ़ सरकार बनाना और कैसे भी वोटों कि गणित को अपने पक्ष में करना मात्र ही रह गया है | हालाँकि 2014 में जब देश के वर्तमान प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार […]

“इंसान को ‘जीने के अधिकार’ के साथ ही ‘मरने’ का भी हक़”: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक बड़ा फ़ैसला सुनाते हुए, बीते कई समय से समाज के पटल पर चल रही एक व्यापक बहस और असमंजस कि स्थिति पर विराम लगा दिया है | दरसल, शुक्रवार को देश कि सर्वोच्च अदालत ने ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत दे दी है | सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच […]

“सिर्फ आज नहीं, ऱोज उठे महिलाओं की ‘सुरक्षा और सम्मान’ के लिए आवाज़”: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस

आज सुबह से देख रहा हूँ, अचानक से सारे न्यूज़ चैनल, अख़बार और सभी के सोशल मीडिया अकाउंट में महिलाओं के प्रति सम्मान, सुरक्षा और उनके हक़ की बातें होने लगी हैं | हर कोई आज बड़ी बेबाकी से महिलाओं के हक़ के प्रति खड़ा नज़र आ रहा है, हर कोई महिलाओं के साथ होने […]

इस ‘राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस’ कुछ ऐसी चीज़ें जिन्हें ‘नहीं मिलनी चाहिए सुरक्षा”

आज यानि 4 मार्च का दिन देश में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस’ के रूप में जाना जाता है | यूँ तो इस दिन के मायने सुरक्षा के संबंध में मुख्यतः स्वास्थ्य और कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा तक ही सीमित किए गये हैं, लेकिन आज हम इसके मायनों की सीमा को बढ़ाने के […]
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