कांग्रेस अध्यक्ष चुनाव: परिवारवाद या मज़बूरी?

हाल के दिनों में देश की राजनीति, आगामी गुजरात चुनावों की वजह से काफ़ी सक्रीय नज़र आ रही है । और ऐसे में देश की दो प्रमुख पार्टियों, बीजेपी और कांग्रेस ने इन चुनावों के मद्देनज़र ज़ोर शोर से आरोप-प्रत्यारोपों और रैलियों का दौर शुरू कर दिया है । इस बीच देश के राजनीतिक पटल पर एक और दिलचस्प बात देखने को मिल रही है और वह है कांग्रेस पार्टी में ‘अध्यक्ष पद’ का चुनाव । दरसल, 5 दिसंबर को कांग्रेस पार्टी अपने नए अध्यक्ष की घोषणा कर सकती है ।

हम आपको बता दें, पार्टी में 1 से 4 दिसंबर तक अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरा जाना था और 5 दिसंबर को इन नामों की स्क्रूटनी होनी है । जिसके बाद 16 दिसंबर को वोटिंग और 19 दिसंबर तक नए अध्यक्ष का ऐलान होना है । लेकिन जैसा की शुरू से ही तय माना जा रहा था, इस पद के लिए अब तक सिर्फ़ वर्तमान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपना नामांकन दाखिल किया है और इस मुताबिक उन्हें 5 दिसंबर को ही निर्विरोध बतौर कांग्रेस अध्यक्ष चुना जा सकता है ।

हालाँकि इस ख़बर में हैरान करने जैसा कुछ भी नहीं है, क्यूंकि इस बात का अंदाज़ा इस देश की राजनीति की थोड़ी भी जानकारी रखने वाले हर व्यक्ति को था । ऐसे में फ़िर सवाल उठता है कि फ़िर इस लंबी चयन प्रक्रिया का ऐलान क्यों?

लेकिन इससे एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या अनेकों दिग्गज़ नामों से भरी देश की एक प्रमुख पार्टी, कांग्रेस में नेतृत्व कर सकने में सक्षम नेताओं की इतनी कमी है कि 4 दिन की नामांकन प्रक्रिया में सिर्फ़ एक ही नाम सामने आ सका?

आख़िर इतने बड़े दल के अध्यक्ष पद के चुनाव की प्रक्रिया में नामांकन के दौरान सिर्फ एक उम्मीदवार का नाम सामने आना, क्या पार्टी में, नेतृव कर सकने में सक्षम नेताओं की कमी को दर्शता है या फ़िर पार्टी किसी मज़बूरी को?

कांग्रेस के लिए इस सवाल का जवाब, किसी विपक्षी पार्टी को चुप करवाने के लिए नहीं, बल्कि कहीं न कहीं कांग्रेस पार्टी में ही कुछ लोगों के बीच पनप रहे एक असंतोष की भावना को शांत करने के लहज़े से अधिक आवश्यक हो जाता है ।

विपक्ष के साथ-साथ, पार्टी के भीतर से भी गूंजे ‘परिवारवाद’ के स्वर

राहुल गाँधी को अध्यक्ष पद का एकलौता दावेदार बनाने पर जहाँ एक ओर कांग्रेस को विपक्षीय पार्टियों से परिवारवाद का तंज सुनना पड़ रहा है, वहीँ पार्टी के भीतर से भी इस स्वर की गूंज आने लगी है | हाल ही में ही कांग्रेस के युवा नेता, शाहज़ाद पूनावाला ने इस प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर, कांग्रेस की स्थिति को और असहज बना दिया है | माना ये भी जा रहा है की शहजाद कई ऐसे कांग्रेसी नेताओं की आवाज़ बनकर उबरे हैं, जो स्वयं किसी न किसी असहजता के चलते खुल कर ये बातें नहीं बोल पा रहें हैं ।

आँकड़े भी नहीं देते राहुल का साथ

हालाँकि राहुल गाँधी बतौर उपाध्यक्ष कितने ही सक्रीय क्यूँ न दिखाई देते हों, लेकिन उनके उपाध्यक्ष कार्यकाल के दौरान हुए तमाम चुनावों के आँकड़े भी राहुल के कार्यकाल को उतना सफ़ल साबित नहीं करते दिखाई पड़ते हैं । कुछ पत्रिकाओं में छपे आँकड़ों की माने तो जनवरी 2013 में राहुल के बतौर कांग्रेस उपाध्यक्ष चुने जाने के बाद कांग्रेस को करीब 27 चुनावों में हार का सामना करना पड़ा है ।

सबसे अधिक समय तक अध्यक्ष रहीं सोनिया गाँधी

राहुल की ताजपोशी के बाद, वह यह पद संभालने वाले नेहरू-गांधी परिवार के छठे शख्स होंगे । वहीँ कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने करीब इन सब में सबसे ज्यादा 19 साल तक अध्यक्ष पद संभाला ।

क्या होगी सोनिया गाँधी की नई भूमिका?  

ख़बरों की माने तो अध्यक्ष पद के चुनावों के बाद सोनिया गाँधी कांग्रेस पार्टी के भीतर मुख्य संरक्षक की भमिूका में नज़र आ सकती हैं ।

राहुल के लिए पार्टी के अंदर और बाहर दोनों हैं चुनौतियाँ

लगभग तय माने जाने वाले कांग्रेस के आगामी अध्यक्ष राहुल गाँधी के लिए चुनौतियों की कमी नहीं होगी | राहुल के सामने वर्तमान समय में कांग्रेस के हालातों को सुधारने से लेकर, पार्टी के भीतर भी ख़ुद को साबित करके स्थापित करने जैसी तमाम चुनौती हैं ।

लेकिन अध्यक्ष चुने जाने के बाद, उनके लिए सबसे पहली चुनौती होगी ‘गुजरात चुनाव’ | दरसल अगर गुजरात चुनाव के परिणाम बीजेपी के पक्ष में हुए, तो बीजेपी राहुल के अध्यक्ष बनने पर कहीं न कहीं सवाल उठाएगी और वहीँ अगर परिणाम कांग्रेस के पक्ष में रहे, तो कांग्रेस इसका सारा श्रेय अपने अध्यक्ष, राहुल गाँधी को देती नज़र आएगी ।

फ़िलहाल एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष बनने के साथ ही राहुल से सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि देश के लोगों को भी काफ़ी उम्मीदें होंगी और हम यही आशा कर सकतें है कि वह इन उम्मीदों पर खरे उतरें ।    

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