July 23, 2018
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विकास की कब्र पर पनपती ‘बदले की राजनीति’: सत्ता, ‘नशा’ या ‘ज़िम्मेदारी’?

  • by Ashutosh
  • February 26, 2018

‘बदले की राजनीति’, इस शब्द को एक लोकतांत्रिक देश की राजनीति में हमेशा से ही बुरा माना जाता रहा है | लेकिन अफ़सोस यह है कि इसके बावजूद पिछले कुछ दशकों से देश के राजनीतिक स्तर में काफ़ी गिरावट आई है | और देश के लिए इससे भी दुर्भाग्य की बात यह है कि इसका कारण कोई एक राजनीतिक दल विशेष नहीं, अपितु देश का पूरा राजनीतिक माहौल ही है |

दरसल, पिछले कुछ दशकों से हमनें यही देखा है कि केंद्र हो या राज्य सरकारें, वह विरोधियों को हरा सत्ता पर काबिज होने के साथ ही ‘बदले की भावना’ से कार्य करने में लग जाती हैं, फ़िर वह योजनाओं के नाम बदलने की बात हो, या रंग या फ़िर ताकत का इस्तेमाल कर विरोधियों को डराने की बात |

और यकीन मानिए, यह बदले की सोच आज की राजनीति में इतनी आम होती जा रही है कि आप किसी भी राज्य के हों या फ़िर केंद्र सरकारों पर गौर करें, आपको हर सरकार में ऐसे तमाम उदहारण बिना ज्यादा प्रयत्न किए ही मिल जायेंगें |

असल में ‘बदले की राजनीति’ को लेकर ऐसी पनपती सोच से अगर कुछ खत्म होता है तो वह है ‘विकास का अवसर’ | जब देश के सत्ताधारी नेताओं से लेकर उनके लिए काम करने वाले अफसर तक सिर्फ़ इसी बात में व्यस्त होंगें कि पुरानी योजनाओं का नाम कैसे बदलें, या विरोधियों को कैसे परेशान करें, तो ऐसे में जनता की फ़िक्र कौन करेगा जनाब? 

कुछ लोगों का यह तर्क भी सामने आता है कि अगर किसी विपक्षी दल के नेता ने कुछ ग़लत किया होगा to उसको सजा देना नई सरकार का कर्तव्य है, इसमें ग़लत क्या है? जी हाँ ! मैं भी उनसे पूरी तरह से सहमत हूँ, यह बिल्कुल सही और दुरुस्त क़दम है, जिसका स्वागत होना चाहिए |

लेकिन चीज़ें ग़लत तब दिखाई पड़ने लगती हैं, जब सत्ताधारी दल इंसाफ की राह में दोहरी नीति अपनाने लगतें हैं | यानि कि अपनों के गुनाहों पर पर्दा डालते हुए, कोई कैसे ख़ुद को इंसाफ का रखवाला साबित कर सकता है?   

एक बात और, यह उपरोक्त बातें किसी विशेष दल या वर्तमान सरकार के लिए ही नहीं, बल्कि उनसे पहले और अन्य राज्यों में बनी हुई दूसरे दलों की सरकारों के लिए भी हैं, दरसल जैसा की मैंने कहा कि यह सोच किसी पार्टी तक सीमित नहीं, बल्कि इसके यह अब एक राजनीतिक सुविधा का रूप ले चुकी है |

सबसे बुरा यह है कि हम सब इसका एहसास होते हुए भी इस गंभीर विषय पर चुप रह जातें हैं, और कहीं इसकी वजह यह तो नहीं कि राजनीति से परे पूरा समाज ही इस बदले की भावना की बीमारी से ग्रसित है?  क्यूंकि राजनेता भी हैं तो इसी समाज का ही हिस्सा, वह किसी दूसरे गोले से आए जन तो नहीं, जिनका मनका (रिमोट) यहाँ खो गया हो, और जिसके चलते वह वापस न जा पा रहें हों :p 

लेकिन विषय बहुत गंभीर है और इस पर मंथन उतना ही जरूरी | क्यूंकि जिनके हाथ में संपूर्ण देश का भाग्य हो, वह ही अगर ऐसी मानसिकता से पीड़ित हैं, तो हम आम जन मानस कैसे मान लें कि हमारा भविष्य सुनहरा हो सकता है?

देश में नेताओं को अब यह समझना चाहिए, कि यह वक़्त है काम के जरिये ख़ुद को सही साबित करने का, न कि सिर्फ दूसरों को ग़लत साबित करने पर वह अपनी ताकत झोकें |

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