June 23, 2018
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दिल्ली राज्यसभा चुनाव: ‘कुमार विश्वास’ की ‘शहादत’ से बढ़ीं ‘केजरीवाल’ की मुश्किलें

  • by Ashutosh
  • January 4, 2018

कल दिल्ली में भारी बहुमत के साथ सरकार चला रही ‘आम आदमी पार्टी’ (आप) ने राज्‍यसभा की उम्‍मीदवारी के लिए अपने तीनों नामों की घोषणा की | एक प्रेस कांफ्रेंस के जरिये दिल्‍ली के उपमुख्‍यमंत्री मनीष सिसौदिया ने इन नामों का ऐलान किया, जिनमें तीन राज्‍यसभा सीटों के लिए संजय सिंह, सुशील गुप्‍ता, नारायण दास गुप्‍ता के नाम पर मोहर लगाई गई | इन नामों का फ़ैसला आम आदमी पार्टी ने PAC की बैठक में किया |

प्रेस कांफ्रेंस में मनीष सिसौदिया ने जानकारी देते हुए बताया कि इस मसले को लेकर पार्टी के भीतर कुल 18 नामों पर चर्चा शुरू हुई, जिसके बाद उनमें से 11 नामों पर गंभीरता से बात की गई |

साथ ही उपमुख्यमंत्री जी ने यह साफ़तौर पर जाहिर किया कि मात्र संजय सिंह को छोड़कर अन्‍य किसी भी नाम पर कोई आम सहमति बनती नज़र नहीं आई | बताया जा रहा है कि कुमार विश्वास द्वारा राज्यसभा सीट के लिए पहले से ही अपना दावा ठोकाने और संजय सिंह के नाम पर प्रत्याशित रूप से चर्चा होने के कारण इन दोनों को इस बैठक के लिए आमंत्रित नहीं किया गया था, जिसके कारण वह इस बैठक से नदारद दिखे |

 तीनों सीटों पर पहले से ही तय हैं ‘आप’ की जीत

दरसल, दिल्ली से तीन राज्यसभा सीटों के लिए 16 जनवरी को चुनाव होगा और 70 सदस्यों के साथ दिल्ली विधानसभा में प्रचंड बहुमत से सरकार चला रही ‘आप’ के लिए तीनों सीटों पर जीतना कोई ख़ास चुनौती नहीं है, और मानों इन तीनों की जीत की घोषणा सिर्फ़ एक औचारिकता मात्र है |

हालाँकि इस परिपेक्ष में बहुमत का होना, ‘आप’ के लिए कहीं न कहीं एक बड़ी परेशानी भी थी, क्योंकि इससे पार्टी जिसकों चाहे राज्यसभा के सदन की गरिमा बढ़ाने का अवसर दे सकती थी | इसी वजह से ऐसा माना जा रहा था कि पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोगों को पार्टी अब उपहार स्वरूप यह अवसर दे सकती है, जिसके कारण इन सब नामों के डॉ कुमार विश्वास के नाम को सबसे आगे माना जा रहा था |

‘पुराने साथियों’ से ज्यादा पार्टी दिखी ‘नए मेहमानों’ पर मेहरबान

इन नामों की घोषणा के बाद से ही पार्टी के भीतर नाराज़गी के दौर शुरू हो गए हैं | घोषित किए गए तीनों नामों में से काफ़ी समय से पार्टी के वफ़ादार रहे, ‘संजय सिंह’ और ‘नारायणदास गुप्ता’ के नाम पर हालाँकि इतनी आपत्ति ज़ाहिर होती नज़र नहीं आ रही है, लेकिन तीसरे नाम, यानि ‘सुशील गुप्ता’ को लेकर पार्टी के भीतर ही लोग नाराज़ नज़र आ रहें हैं |

हम आपको बता दें कि सुशील गुप्ता ने कुछ समय पहले ही कांग्रेस से इस्तीफ़ा देकर ‘आप’ का दामन थामा है | यह दिल्ली के एक बड़े कारोबारी नाम में से एक हैं | कुछ ख़बरों की माने तों सुशील गुप्ता के दिल्ली और हरियाणा में 25 से 30 स्कूल, कॉलेज और अस्पताल हैं और उनका हरियाणा में काफ़ी अच्छा नेटवर्क है | इसके साथ ही वह वैश्य समाज मे भी अच्छी साख रखते हैं | इस लिहाज़ से पार्टी को लगता है इनके जरिये वह हरियाणा में अपना आधार मजबूत कर पाएगी |

लेकिन इन सब के बीच एक प्रत्याशित चीज़ न होने से पार्टी के भीतर और बाहर भी इस फ़ैसले की आलोचना होने लगी है | दरसल पार्टी के संस्थापकों में से एक और पार्टी के लिए हमेशा एक मजबूत स्तंभ माने जाने वाले कुमार विश्वास का नाम लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन उनको दरकिनार कर, सुशील गुप्ता का नाम प्रस्तावित करना एक चौकानें वाले कदम के रूप में देखा जा रहा है | जिससे पार्टी के एक कार्यकर्ता वर्ग ही नहीं, बल्कि कई अन्य नेता और ख़ुद कुमार विश्वास आहत दिखाई दिए |

इस फ़ैसले को विश्वास ने बताया अपनी ‘शहादत’

‘आप’ की ओर से राज्यसभा उम्मीदवार के तौर पर नामांकित न किए जाने के बाद मशहूर कवि और पार्टी संस्थापकों में से एक, कुमार विश्वास का दर्द साफ़ रूप से सामने आया और उन्होंने इस पर बयान देते हुए कहा,

” मुझे सर्जिकल स्ट्राइक, टिकट वितरण में गड़बड़ी, जेएनयू समेत अन्य मुद्दों पर सच बोलने के लिए दंडित किया गया है और मैं इस दंड को स्वीकार करता हूँ और उनको बधाई देते हुए अपनी शहादत स्‍वीकार करता हूं “

” युद्ध का भी एक छोटा नियम होता है कि शहीदों के शव से छेड़छाड़ नहीं की जाती “

साथ ही कुमार ने पत्रकारों से यह भी कहा,

” मुझे डेढ़ साल पहले अरविंद ने बुलाकार कहा था कि सर जी आपको मारेंगे लेकिन शहीद नहीं होने देंगें “

कुमार जहाँ एक ओर इस फ़ैसले से काफ़ी आहत दिखे, वहीँ उन्होंने इशारों ही इशारों में अपनी योग्यता के प्रमाण भी दिए और कहा,

” मैं नैतिक रूप में मानता हूं कि ये एक कवि, एक मित्र और सच्‍चे आंदोलनकारी की जीत है, इस सब के बीच मैं पिछले 40 वर्ष से मनीष के साथ काम कर रहा हूँ और साथ ही 12 साल से अरविंद के साथ काम कर रहा हूँ, मैंने सात साल से कार्यर्ताओं के लिए और पांच साल से आम आदमी पार्टी के लिए भी अपना काफ़ी समय दिया है “

वाजिफ़ है कुमार का दर्द? 

आम आदमी पार्टी कई बार अपने आंतरिक फैसलों के कारण परेशानियों में लिप्त देखी गई है और इस बार भी यही होता देखा जा सकता है | दरसल सिर्फ़ कुमार ही नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर और बाहर कार्यकर्ताओं में भी पार्टी के इस फ़ैसले से असंतुष्टि का माहौल बनता नज़र आ रहा है |

कुमार न सिर्फ़ ‘आप’ के संस्थापकों में से एक हैं, बल्कि इस पार्टी को इतने बड़े मुक़ाम तक लाने में उनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही है | वह न सिर्फ़ पार्टी के अंदर बड़े और समझदार नेता के रूप में जाने जाते हैं, बल्कि विपक्षी दलों में भी उनको लेकर इज्ज़त और सम्मान साफ़ तौर पर देखने को मिलता है |

सिर्फ़ ‘नाम’ नहीं ‘काबिलियत’ के लिहाज़ से भी ‘कुमार’ थे एक खरे उम्मीदवार

कुमार विश्वास को सिर्फ़ पार्टी में उनकी भूमिका और बड़े कद की वजह से नहीं बल्कि उनकी वाकपटुता और सूझबुझ के कारण भी उम्मीदवारी की दृष्टि से प्रथम स्थान पर देखा जा रहा था | उनके होने से न सिर्फ़ सदन के माहौल में जिंदा कविताओं की रौशनी मिलती, बल्कि सदन में होने वाली बहसों के स्तर में भी स्पष्ट रूप से इजाफ़ा देखने को मिलता |

कहीं यह मुद्दा न बन जाए केजरीवाल और विश्वास के बीच दरार की वजह

इस फ़ैसले के बाद से विश्वास सहित कई ने नेताओं की जैसी प्रतिक्रियाएं आयीं हैं, उससे यह कयास लगने लगे हैं कि कहीं न कहीं केजरीवाल और विश्वास के रिश्तों में खटास आने लगी है | हालाँकि खुल कर किसी ने किसी का विरोध नहीं किया है, लेकिन शब्दों के खेल के माहिर विश्वास ने अपने चंद शब्दों से अपनी आहत हुई भावनाओं का परिचय दिया है |

इस बीच इस अटकलों पर विराम लगाने की दृष्टि से मनोनित उम्मीदवार संजय सिंह ने कहा है कि कुमार हमारे साथ थे और हमेशा ही रहेंगें | हालाँकि देखने वाली बात यह है कि अब इस विषय से शुरू हुए इस प्रकरण को कहीं और आगे तो नहीं ले जाया जाएगा, जिससे पार्टी में बिखराव की स्थिति पनपने ?

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