आख़िर कितना उचित है ‘किरण खेर के बयान’ से पनपा ‘विवाद’?

शब्दों का खेल हमेशा से ही उलझाने वाला रहा है, वक्ता और श्रोता दोनों के लिए ही | और अगर शब्दों के अर्थ को ग़लत अनुमानित कर लिया जाए, तो शायद इसे, कहने वाले की धारणा के साथ नइंसाफी ही समझा जाएगा | और ख़ास तौर पर जब वो शब्द किसी लोकप्रिय हस्तियों के हों, तब धारणाओं के खेल और भी रोचक नज़र आने लगतें हैं |

दरसल, ऐसा ही एक मामला फ़िर सामने आया है | कुछ दिन पहले ही चंडीगढ़ रेप केस में बीजेपी सांसद और अभिनेता अनुपम खेर की पत्नी, किरण खेर द्वारा दिए गए बयान ने विवाद का रूप ले लिया है |

किरण के कथन के पहले हम आपको रूबरू करवा दें कि यह किस सिलसले में कहा गया | दरसल, 17 नवंबर को मोहाली में एक पीजी में रहने वाली 22 वर्षीय लड़की के साथ ऑटो ड्राइवर और उसके दो अन्य साथियों ने गैंगरेप किया और बाद में लड़की को सेक्टर 57 में फेंककर फ़रार हो गए। तभी वहां से गुजर रहे एक आदमी कि नजर जब लड़की पर पड़ी तो उन्होंने पुलिस को सूचित किया | इस बीच तीनों आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है |

इसी सिलसिले में किरण खेर ने अपने वक्तव्य में कहा कि,

“ जब लड़की को इस बात का अंदाजा था कि ऑटो में पहले से ही तीन आदमी बैठे हुए हैं तो उसको उस ऑटो में नहीं बैठना चाहिए था ”

हालाँकि इस बात को साफ़ करते हुए उन्होनें अपने अनुभव भी साझा किए और कहा कि

“ हम लोग भी कभी मुंबई में कभी टैक्सी लेते थे, तो जो हमारे साथ हमें छोड़ने आता था, हम उन्हें अपना टैक्सी नंबर लिखवा देते थे क्योंकि एक लड़की होने के नाते हमें खुद की सुरक्षा का ख्याल रखना चाहिए और मुझे लगता है कि हम सभी को आजकल के जमाने को देखते हुए थोड़ा सतर्क रहने की आवश्यकता है ”

उनके इस कथन को तो किसी भी प्रकार के स्पष्टीकरण की जरूरत नहीं है | लेकिन नसीहत की तर्ज पर कहे गए इसके पहले वाले कथन को प्रथक रूप से देखतें हुए शायद कई लोगों ने इनकी बातों का अलग भी मतलब समझा |

परिणामस्वरूप कांग्रेस नेता पवन कुमार बंसल सहित कई लोगों ने किरण खेर के बयान की जमकर आलोचना की |

असल सवाल यहाँ किसी को गलत या सही ठहराने का नहीं है | यह बात भी जायज़ है की देश के हालत महिलाओं के लिए उतने सुरक्षित नहीं हैं और इन हालातों को सुधारने की बहुत जरूरत है और यह सबका बराबर का उत्तरदायित्व भी है |

लेकिन आप ख़ुद सोचिए, ऐसे माहौल के बीच क्या लड़कियों को ऐसी सलाह देना उचित नहीं? जी हाँ ! आप यह जरुर कह सकतें हैं कि लड़कियों को ही हर सावधानी क्यूँ? आख़िर समाज कब तक ऐसी हरकत करने वालों को उचित दंड देने के साथ ही, उनका बहिष्कार करना शुरू करेगा?

सवाल दोनों जायज़ हैं, लेकिन आपको नहीं लगता कि आजकल के समाज में जब अच्छे बदलावों को अपनाने में काफ़ी वक़्त लगने लगा है, वहाँ हमें अपनी सुरक्षा हेतु कई एतिहात बरतने चाहिए | और हम इसको महिलाओं की आजादी से नहीं जोड़ सकते, क्यूंकि न तो उनके वक्तव्य में उन्होंने और न ही कोई अन्य ज़िम्मेदार व्यक्ति कभी महिलाओं की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाए जाने की बात को सही ठहरा सकता है |

असल में ‘सावधानी बरतना’ और ‘व्यक्तिगत आज़ादी का उल्लंघन’ दोनों ही काफ़ी भिन्न चीज़ें हैं |

किरण ने भी दी सफ़ाई

किरण खेर ने भी अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि

“मैंने तो कहा था कि जमाना बहुत खराब है। बच्चियों को एहतियात बरतनी चाहिए। अगर कोई लड़की रात में 100 नंबर पर फोन करती है तो चंड़ीगढ़ पुलिस पीसीआर भेजती है, उसका इस्तेमाल होना चाहिए और साथ ही इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए”

यहाँ एक बार फ़िर इस बात को दोहरा दिया जाए कि मुख्यतः यहाँ किसी को सही या ग़लत साबित करने की होड़ नहीं है |

मुद्दा सिर्फ़ इतना है कि देश में इस बिगड़ते माहौल को देखते हुए, हमें समाज में मौजूद ऐसे दुष्कर्म करने वाले लोगों के खिलाफ़ एकजुड़ता से खड़े होकर, इनका हर प्रकार से बहिष्कार करने की जरूरत है |

और बिना ‘व्यक्तिगत आज़ादी’ के असल भाव को ठेस पहुंचाए, अगर लड़कियों की सुरक्षा से जुड़ी कुछ नसीहतें पेश की जाएँ, तो इसे उनकी आज़ादी का उल्लंघन समझने के बजाये, सिर्फ इतिहाती तौर पर उठाए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए | साथ ही जितना हो सके इन मुद्दों पर राजनीतिक मंशा से ऊपर उठ कर चर्चा करनी चाहिए |

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *