May 26, 2018
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यादों का पिटारा: बचपन के वो ‘खिलौने’ जिन्हें देख, आज भी ललचाता है मन

  • by Ashutosh
  • January 20, 2018

ज़माने बड़ी तेज़ी से बदलते हैं, और अगर आपको इसका साक्ष्य चाहिए, तो जरा एक बारे अपने बचपन के दिनों को याद करिए, जों चीज़ें कभी हम सभी के बचपन में हमारा मन बहलाती थी, हमें ख़ुशियों का एक बहाना दे जाती थीं, वो थे उस समय के ‘खेल-खिलौने’, जो अब शायद ही देखने को मिलतें हैं |

लेकिन क्या आपने आजकल की व्यस्त जिंदगी से थोड़ा वक़्त निकाल कर कभी यह सोचा है, कि आख़िर कहाँ गायब हो गई वो सभी चीज़ें, वो ख़ुशियों के मनपसंद बहाने, वो हमारे गुजरे ज़माने |

जनाब ! ऐसा तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि वो खेल-खिलौने आज के दौर के बच्चों का मनोरंजन करने में नाकाम साबित होते, आज के नए मोबाइल ऐप आधारित गेम भले ही बच्चों को लती बन लेते हों, लेकिन उन खेल और खिलौनों का नशा भी कम नहीं था | हफ़्ते भर वो छुट्टियों का इंतजार, उन खेलों के नशे को ख़ुद ब ख़ुद बयाँ कर देता था |

लेकिन अब वक़्त कहाँ है उन यादों को दोहराने का, उस सुनहरे पलों को फ़िर से जी पाने का | शायद इसलिए किसी ने सच ही कहा है,

“ सुकून की बात मत कर ऐ दोस्त,

        बचपन वाला इतवार अब नहीं आता ”

लेकिन आज हम आपके लिए लेकर आयें हैं उन्हीं सुनहरी ‘यादों का पिटारा’, जिनकों देख कहीं न कहीं आपके दिल में सुकून की महक और चेहरे पर मंद सी मुस्कान तो जरुर आ जाएगी |

1. एक्खट-दुक्खट (Hopscotch)

याद है आपको वो सफ़ेद chalk से बनी चौकोर लकीरें, जिन पर 1 से 8 तक की गिनती ख़ुशी ख़ुशी लिखी जाती थी……जी हाँ ! यह वही खेल है, जिसको हम भले ही अपने अपने नामों से जानते हों, लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि इसको खेलने का तरीका और रोमांच सभी में सामान तौर पर होगा | कैसे हमें कुछ खानों पर एक पैर से चलने की कोशिशें करनी पड़ती थीं, तो कभी कुछ खानों पर हम दोनों पैरों को रखना  भूल जाते थे 😀 और सबसे बड़ी चीज़ पत्थर को सही खाने में फेखना, जो की अधिकतर ही सही के बजाए, बाकी हर खाने में जाने को बेताब नज़र आता था -_-

2. पोशम्पा भई पोशम्पा.!! (Poshampa)

इस शब्द को सुनते ही कई जुबानों ने अब तक पूरा गाना भी गा लिया होगा 😀 जी हाँ ! यह वही खेल है जहाँ दो लोग अपने हाथों से एक दरवाजा बनाते और ‘पोशम्पा’ गाते  थे, और अन्य साथी उस गाने के खत्म होने के पहले पहले उस दरवाजे से निकले की कोशिश करते रहते थे, कि कहीं गाना खत्म होने पर उन्हें उस दरवाजे में ही न जकड लिया जाए |

लेकिन यक़ीनन आप भी यह तो मानते ही होंगें कि वो जकड़न आज कि वक़्त की जकड़न से कहीं अधिक मज़ेदार थी |  😉

3. लुका-छिपी (Hide and seek)

बचपन में तो मानों ऐसा लगता था, यही भारत का राष्ट्रीय खेल है और मुझे पूरा यकींन है इस खेल में आपके साथ भी यह जरुर हुआ होगा, की आप छिप कर किसी के द्वारा ढूंढे का इंतजार कर रहे हों और वो इंसान घर या कहीं जाकर आराम से खाने के मजे ले रहा हो, -_- विश्वास करिये ये इश्क़ में मिले धोखे से भी बड़ा धोखा होता था -_-

4. सांप सीढ़ी (Snakes and Ladders)

यूँ तो आज इस खेल पर आधारित अनेकों एंड्राइड ऐप मौजूद हैं, लेकिन अपने हाथों से पासा फ़ेकने और अपने विरोधी को सही गिनती सिखाने, कि ‘तुम्हें सांप काट रहा है, चीटिंग मत करो’ जैसी चीज़ों के अपने ही मज़े होते थे 😀

5. विडियो गेम्स (Video Games)

यह इसलिए इस लिस्ट में शुमार किया, ताकि आज के दौर को बच्चों को ये न लगे, कि तकनीक में हम पीछे थे, आख़िर उस भी विडियो गेम हुआ करते थे, जिनको टीवी सेट से जोड़ना ख़ुद को अलग ही सुकून दे जाता था | और ख़ास तौर पर जब पहले खेलने की बारी आपकी ही हो 😉

इन विडियो गेम कंसोल की वो कैसेट्स तो सबको याद होंगी, जिनको यह कह कर हमें बेचा जाता था, कि इसमें हमें 100 से ज्यादा गेम मिलेंगे और हमेशा की तरह उसको लगाने पर वही 10-15 गेम हमेशा रिपीट होते थे |

लेकिन इस दिल दहला देने वाले धोखे के बीच भी हमें जो गेम अपनी ओर सबसे ज्यादा खीचते थे, वो थे ‘मारियो(Mario)’ और ‘डक हंट(Duck Hunt)

इस बीच अगर इस यादों की लिस्ट में आपका कोई अपना पसंदीदा खेल रह गया है या आपकी भी कोई बचपन की हसीन यादें इनसे जुड़ी हुई हैं, तो आप अपनी यादें और अपनी पसंद हमारे साथ कमेंट बॉक्स में जरुर साझा करें | आख़िर वक़्त कितना भी बदल जाए, लेकिन ‘दिल तो आज भी बच्चा है जी!’, और वैसे भी कहते हैं न ‘वक़्त कितना भी बदले, लेकिन इंसान के अंदर कहीं न कहीं बचपन जिंदा रहना चाहिए 😉

 

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