August 14, 2018
  • facebook
  • twitter
  • linkedin
  • instagram

छोटे शहर का बड़ा सितारा: नवाज्ज़ुद्दीन सिद्द्की

  • by Ashutosh
  • January 28, 2018

सच कहतें हैं, दरिया को रास्ता नहीं दिखाना पड़ता, वो अपना रास्ता ख़ुद बना लेती है, इस बीच न तो वो रास्ते में आने वाले दर्रों का रोना रोती है और न ही चट्टानों का, वह बस अपनी ही धुन में बहती चली जाती है । ये कहानी है एक ऐसे ही शख्स की, जो ख़ुद की काबिलियत के दम पर आज रुपहले पर्दे पर मंजे हुए कलाकारों की लाइन में एक प्रचलित नाम बनकर खड़ा है । मुज्जफरनगर के एक छोटे से गाँव में एक किसान के बेटे ने अपने रस्ते मेंआने वाली हर मुसीबत को गले लगाते हुए आज न सिर्फ़ राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अपने नाम का सिक्का मनवाया है, और वह नाम है नवाज्ज़ुद्दीन सिद्दकी ।

किसे पता था, मुज्जफरनगर जैसे छोटे शहर, जहाँ गेहूँ, गन्ना और गन (बंदूक) तीनों ही चीज़ें सबसे ज्यादा पाई जाती हों, वहीँ एक ऐसा मंजा कलाकार भी पाया जाएगा ।

19 मई 1974 को एक छोटे से किसान के घर सात भाईयों और दो बहनों के बीच जन्में नवाज्ज़ुद्दीन को पिता के साथ खेतों में काम करते वक़्त, इस बात का कहाँ अंदाज़ा था कि उनके अंदर अदाकारी का बीज छुपा हुआ था, जिसे निखरने के लिए चाहिए था तो महज़ जरा सी जमीन और थोड़ा सा खाद पानी । अपनी स्कूली तालीम मुज्जफ़रनगर से ही पूरी करके नवा़ज्जुद्दीन ने देहरादून की गुरूकुल कांगरी यूनिर्वसिटी से ग्रेजुएषन की और फिर वहीं एक केमिस्ट की नौकरी करने लगे। बचपन से ही पढ़ाई में कुछ खास न थे इसलिए उन्हें किसी खास नौकरी की उम्मीद भी नहीं थी ऐसे में जो नौकरी मिली उन्होंने वही कर ली । कुछ ही दिनों में केमिस्ट की नौकरी उबाउ लगने लगी तो नौकरी छोड़ दी ।

ऐसा क्या था जो वो करना चाहते थे?, इस सवाल का जवाब खुद उनके पास भी नहीं था । लेकिन इस सवाल का जवाब ढूंढते-ढूंढते वह पहुँच गए दिल्ली और गुज़ारा करने के लिए चैकीदार की नौकरी करने लगे । इस नौकरी से वक्त निकाल कर वह अक्सर थियेटर जाया करते थे । बस एक रोज़ थियेटर में ही ड्रामा देखते हुए महसूस हुआ की वो थियेटर ही तो है जो उन्हें सुकून देता है, आखिर ये ही वो काम है जिसकी तलाश में वो भटकते फिर रहे थे । लेकिन अभी भी थियेटर की फीस थी जो मुसीबत बने सामने खड़ी थी पर मज़बूत इरादों के आगे इस मुसीबत को भी झुकना पड़ा और जैसे-तैसे पैसों का जुगाड़ करके 1996 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (दिल्ली) से एक्टिंग की डिग्री लेने के बाद, वह चल पड़े सपनों के सफ़र की ओर, जिंदगी को नए तरीके से संवारने । लेकिन बड़े शहर में जमे रहने के लिए आंखों में सपने ही नहीं ज़ेब में पैसे भी होने चाहिए । नव़ाज्जुद्दीन सपनों का बड़ा सा झोला ले कर दिल्ली छोड़ कर मायानगरी तो चले आए थे पर ज़ेब की तंगी ने यहाँ उनका पीछा नहीं छोड़ा । ऐसे में उन्होंने दिल्ली के अपने एक सीनियर का सहारा लिया, जो वहीं गोरेगाँव में रहते और थियेटर में काम किया करते थे । घर का किराया देने के पैसे तो नहीं थे, तो ऐसे में नव़ाज्जुद्दीन ने खना बनाने, पोंछा मारने, कपड़े धुलने जैसे घर के सारे काम करने का वादा किया ।

फिल्मों में चेहरा बनाने की मुश्किलें उनके लिए कम नहीं थीं क्योंकि देशी मिट्टी में सने नव़ाज्जुद्दीन के पास बॉलीवुड की पसंद वाला रूप रंग तो नहीं था, लेकिन अगर कुछ था तो वो था, करीने से तराशा हुआ एक कलाकार जो उनके अंदर छुपा था । जिसे बाहर निकलने के लिए चाहिए था एक मंच और अपने अंदर के इस कलाकार को ही मंच देने के लिए उन्होंने फिल्मी गलियारों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए । मेहनत और भाग दौड़ ने उन्हें आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश(1999)’ में डेब्यू रोल तो दिलाया पर रोल इतना छोटा था कि पलक झपकते ही खत्म हो जाए । कला की इबादत करने वाले नव़ाज्जुद्दीन को पता था की हर रोलअपने आप में खास होता है वो चाहे तीन सेकेंड का हो या तीन घंटे का । 2003 में इन्होंने इरफ़ान खान के साथ एक शार्ट फिल्म ‘बाईपास’ की, इस फिल्म के बाद उन्हें कई फिल्मों में रोल मिले, जैसे मनोज वाजपेयी की फिल्म ‘स्कूल’ में वेटर का रोल, सनी देओल की फिल्म ‘सलाखें’ और संजय दत्त की फिल्म ‘मुन्ना भाई MBBS’ में जे़ब कतरे का रोल । नव़ाज्जुद्दीन ने हर रोल को बड़ी ही गंभ्भीरता और अकीदत के साथ निभाते हुए अपना शत प्रतिशत दिया ।

हालाँकि बॉलीवुड में इन्हें खड़े होने की जमीन अनुराग कश्यप की फिल्म ब्लैकफ्राइडे (2004) से मिली | इस फिल्म में उनकी एक्टिंग ने बॉलीवुड के डायरेक्टरों का ध्यान खींचने पर मज़़बूर कर दिया । 2007 में इन्हें प्रशांत र्भागव की शार्ट फिल्म ‘पतंग’ में लीड रोल मिला । इस रोल में उन्होंने ऐसी जान फूँकी की फिल्म का प्रीमियम बरर्लिन  फिल्म फेस्टिवल में हुआ । इसके बाद 2009 फिर से अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी’ के गाने ‘इमोशनल अत्याचार’ में कैमियो रोल और इसके बाद ‘न्यूयार्क’ जैसी मल्टीस्टारर फिल्म में भी इन्होने खूब वाह-वाही बटोरी । अब क्या था, 2010 में आमिर खान प्रोडक्शन की फिल्म ‘पिपली लाइव’ में पत्रकार के किरदार को नवाज़ ने इस कदर निभाया कि फिल्म को ऑस्कर नॉमिनेशन मिला ।

इसके बाद मानों बॉलीवुड नव़ाज्जुद्दीन की कला का प्रेमी सा हो गया । उन्हेंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में पारंपरिक तरीके से हट कर सोचने का एक नया आयाम देने के लिए खूब तारीफें पाईं । इसके बाद तो मानों नवाज्ज़ुद्दीन की ज़िन्दगी में फिल्मों की लाइन सी लग गयी, और इसमें ‘पान सिंह तोमर’, ‘तलाश’, ‘कहानी’, मांझी:द माउंटेन मैंन’, ‘बदलापुर’, ‘रईस’ जैसी कई फिल्मों के नाम जुड़ते जा रहें हैं ।

लेकिन सफ़लता के इस चरम को छूने वाले नवाज्ज़ुद्दीन आज मुम्बई के अंधेरी वेस्ट की यारी रोड पर अपने परिवार के साथ रहते हैं और गर्व से यह कुबूल करते हैं कि

“ मैं एक किसान का बेटा हूँ, मेरे पिता जी आज भी किसान हैं और मुझे इस बात को बताने में कोई शर्म नहीं आती, माँ-बाबु जी बुधना में ही रहते हैं क्योंकी शहर का दमघोंटू माहौल उन्हें रास नहीं आता, हालाँकि वो अक्सर मुम्बई आते-जाते रहते हैं ”

इनकी ज़िन्दगी के इन आयामों को देखने के बाद ऐसा ही लगता है कि ‘हज़ारों मुश्किलों के बावज़ूद पूरी शिद्दत से लड़ना और फिर निखर कर दुनिया के सामने आना, नव़ाज्जुद्दीन सिद्दकी इसका जीता जगता उदहारण हैं ।

Previous «
Next »

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *