February 21, 2018
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वैलेंटाइन स्पेशल: समाज की बेरुखी के बीच कुबूल होती ‘मोहब्बतें’

  • by Ashutosh
  • February 11, 2018

‘प्यार’, ‘इश्क़’ या ‘मोहब्बत’, नाम आप हज़ार दे दीजिये, लेकिन इस नाम के एहसास का रंग सबमें एक सा ही चढ़ाता है | कहतें हैं, इश्क़ किसी से भी किया जा सकता है, इसको सिर्फ किन्हीं दो लोगों के बीच समेटना शायद इसके सिर्फ एक ही आयाम को प्रस्तुत करना कहा जा सकता है | मोहब्बत का एक रंग वह भी जो लोग अपने देश से करते हैं, तो मोहब्बत का एक रंग वह भी है जो लोग अपने माँ-बाप से करते है, कभी मोहब्बत का यह रंग दो अजनबियों को बांध देता है, तो कभी किसी को सिर्फ मोहब्बत के एहसास से ही मोहब्बत हो जाती है |

दरसल मोहब्बत एक ऐसा शब्द है, जिसको समझने और तलाशने की कोशिशें हर दौर में होती रहीं हैं, फ़िर चाहे वो ग़ालिब के शब्दों में छिपी उनकी माशूका की मोहब्बत हो या मुन्नवर राना साहब की पंक्तियों में एक बेटे के प्रति उसकी माँ की निःस्वार्थ मोहब्बत | 

खैर! वक़्त अभी ‘वैलेंटाइन वीक’ का है, तो थोड़ा इश्क़ के इस आयाम पर भी गौर फरमा लिया जाए | हालाँकि हमारे समाज में आज भी दो अजनबियों की मोहब्बत को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, और इसका विरोध भी होता नज़र आता रहता है | लेकिन इन सब के बीच हर दौर की तरह इश्क़ को यह दौर भी कैद नहीं कर पाया है | हालाँकि अब देश की सर्वोच्च अदालत ने भी बालिग इश्क़ को जायज़ ठहराया है, लेकिन अभी भी समाज की मूल सोच में थोड़े बदलाव की दरकार नज़र आती है | इस पर फ़िराक गोरखपुरी ने भी कहा है,

कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं

जनाब! ‘इश्क़’ हर दौर में ‘पाक’ रहा है, बस गलतियाँ हुई तो कभी समझने वालों की तरफ़ से, तो कभी ख़ुद समझाने वालों की तरफ़ से |

आज भी शायद अधिकांश समाज मोहब्बत से मोहब्बत नहीं कर पाया हो, लेकिन सच तो यह भी है कि नफ़रतों के बीच जब मोहब्बत अपनी मुक्कमल जगह बना पाती है, तब उसका एहसास और रंग और भी गढ़ा होता नज़र आता है | 

हालाँकि आज भी कई ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जब प्यार के खिलाफ़ समाज का क्रूर और हिसंक चेहरा नज़र आता है, और साथ ही कई ऐसे भी उदाहरण हैं, जहाँ प्यार करने वाले ही प्यार को बदनाम करते नज़र आते हैं |

दरसल यहाँ मैं समाज को कोई भाषण नहीं देना चाहता | चाहता हूँ तो बस बस इतना बताना कि मोहब्बत और मोहब्बत को लेकर नफ़रत, दोनों के कुछ वसूल हैं | जहाँ आज के नौजवान आशिकों को ‘माशूका की मोहब्बत के रंग में लिपटी ग़ालिब की पंक्तियों’ से मोहब्बत के असल मायने समझने की जरूरत है, तो वहीँ पढ़े-लिखे समाज को भी यह समझना चाहिए की मोहब्बत की खिलाफ़त के भी कुछ अपने सलीकें हैं |

आज इस विषय पर बात करने का मकसद सिर्फ इतना सा है कि मोहब्बत के लिए ख़ास तौर पर मुकरर इस ‘वैलेंटाइन वीक’ में हम प्यार करने वालों और उसके खिलाफ़ सोच रखने वाले दोनों पक्षों से यह गुजारिश कर सकें कि “मोहब्बत के रंग पर आज के दौर में कुछ दाग लगते नज़र आ रहें हैं, और इसके लिए कहीं न कहीं प्यार करने वाले और उस प्यार की खिलाफ़त करने वाले, दोनों ही ज़िम्मेदार हैं, साक्षरता के इस दौर में क्या मैं दोनों पक्षों से सिर्फ इतनी भी उम्मीद नहीं कर सकता कि हम आज मोहब्बत के असल मायनों को समझें और जो मोहब्बत से नफ़रत को भी मोहब्बत से ही निभाएं |”   

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