June 19, 2018
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‘विचारधारा’ को ताक़ में रख सिर्फ़ ‘वोटों की गणित’ तक सिमटी राजनीति

  • by Ashutosh
  • March 13, 2018

‘राजनीति’, कभी इस  शब्द के मायने विचारधाराओं के इर्द-गिर्द घूमा करते थे, लेकिन कुछ दशकों से देश में राजनीति का मलतब सिर्फ़ सरकार बनाना और कैसे भी वोटों कि गणित को अपने पक्ष में करना मात्र ही रह गया है |

हालाँकि 2014 में जब देश के वर्तमान प्रधानमंत्री, श्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार के लिए रैलियों का आगाज़ किया, तब उन्होंने अपने हर भाषण में भ्रष्टाचार और आपराधिक प्रवृत्ति में लिप्त नेताओं के खिलाफ़ जम कर मोर्चा खोला था और देश कि जनता को यह यकीन दिलाया था कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई, तो ऐसे लोगों के खिलाफ़ कठोर कार्यवाई कि जायेगी |

लेकिन अब सरकार बनने से बाद, बीते कुछ सालों से बीजेपी ने देश कि राजनीति में मानों एक नई पहल चलाई है | जिन लोगों के खिलाफ़ पार्टी और पार्टी के बड़े-बड़े नेताओं ने कभी ख़ुद भ्रष्टाचार और आपराधिक प्रवृत्ति के होने के पुरज़ोर तौर पर आरोप लगाये थे, अब पार्टी उन्हें ख़ुशी-ख़ुशी गले लगा रही है | 

इस सन्दर्भ में किसी एक विशेष नेता या चेहरे का नाम लेना गलत होगा, जो सत्ता में आने के बाद विरोधी से सीधे बीजेपी के पक्षकार बन बैठे हैं, क्यूंकि ऐसे असंख्य चेहरे हैं और आप खुद आय दिन खबरों में ऐसे कई चेहरों में से नक़ाब हटते देख रहें हैं |

हालाँकि मेरा सवाल उनसे नहीं है, मेरा सवाल एक ऐसे बड़े राजनीतिक दल से है, जिसको देश भर में उनके नेता द्वारा प्रचारित कि गई विचारधारा के चलते एक सरकार चलाने का भारी बहुमत मिला, लेकिन आज वही नेता और वही दल शायद देश भर में सत्ता हासिल करने के बाद यह भूल बैठे कि जिन लोगों को आज वो गले लगा रहें हैं, चुनावों के दौरान उन्हीं के कारनामों को उजागर कर-कर उन्होंने देशवासियों का समर्थन जीता था |

शायद कुछ लोग कहें कि यही तो राजनीति है, राजनीति में तो यह सब आम है, हर पार्टी यही करती है | लेकिन शायद फिर ऐसे लोगों को या तो राजनीति का असल मतलब नहीं पता या फिर वह अपने ही प्रिय राजनेताओं से थोड़े भी आदर्शों की उम्मीद छोड़ बैठे हैं |

दरसल जनाब! राजनीति कि मूल परिभाषा का आधार ही ‘विचारधारा’ है, और यदि विचारधारा का प्रदर्शन कर कोई पार्टी इतना भारी बहुमत हासिल करती है, तो उससे यह अपेक्षा होती है कि वह अपनी विचारधारा पर कम से कम समझौता न करे | लेकिन आज कि जो दशा है, बीजेपी को यह समझना होगा कि जनता साफ़ तौर पर देख रही है, कैसे बीजेपी वह विचारधारा को ताक़ पर रख सिर्फ़ वोटों कि गणित करने में सिमटी नज़र आ रही है | 

और अगरकोई ये सफ़ाई दे कि आज कि राजनीति कि ही यही व्यवस्था है, तो फिर मेरा उनसे एक सवाल है, अगर यही सोच है, तो हम किस आधार पर कह दें कि जिनका विरोध कर बीजेपी ने आज सत्ता हासिल की है, वह उनसे भिन्न है ?   

लोगों कि प्रतिक्रिया

 

 

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