July 23, 2018
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क़िरदार को निभाने नहीं, क़िरदार को ‘जीने’ वाले अदाकार: ‘फारुख शेख’

  • by Ashutosh
  • March 25, 2018

अगर आप उन भाग्यशाली लोगों में से एक हैं, जिन्होंने ‘चश्मे बद्दूर’ के किरदार सिद्धार्थ पराशर, ‘उमराव जान’ में नवाब कि भूमिका वाले किरदार और फिल्म ‘साथ-साथ’ के बेबस बेरोजगार युवक के क़िरदार को देखा है, तो शायद मुझे नहीं लगता आपको इन किरदारों को निभाने वाले शख्स ‘फारूख शेख’ की अदाकारी के बारे में कुछ भी बताने की जरूरत है |

फारुख शेख कुछ उन चुनिदा अभिनेताओं में से एक रहे, जिन्होंने रुपहले पर्दे पर निभाए गये अपने हर किरदार को अभिनय के वक़्त खुद भी जीया और साथ ही लोगों के बीच भी उसे अमर कर गये |

दरसल 70 वर्ष पूर्व आज ही के दिन 25 मार्च, 1948 को गुजरात के बड़ौदा जिले के निकट एक जमींदार परिवार में जन्मे फारुख शेख अपने पाँचों भाई बहनों में सबसे बड़े थे | पिता के पेशे से वकील होने के कारण उन्हीं के पदचिन्हों पर चलते हुए फारुख ने भी शुरुआत में वकालत के पेशे को ही चुना, लेकिन कहते हैं न, कुछ लोग अदाकारी को नहीं चुनते, बल्कि अदाकारी उन्हें चुनती हैं, और कुछ ऐसा ही हुआ फारूख शेख साहब के साथ भी | जब वकालत में वह खुद अपनी पहचान न ढूंढ़ पाए, तब उन्होंने अभिनय कि ओर अपने करियर का रुख मोड़ा और एक बार शुरू किये गये इस सफ़र में फिर उन्होंने कभी पीछे पलट कर नहीं देखा |

फारूख साहब ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की और वह भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) और जाने-माने निर्देशक सागर सरहदी के साथ जुड़े रहे | आगे चलकर उन्होंने फिल्म के साथ ही साथ टीवी में भी काम किया, लेकिन वह थिएटर से हमेशा जुड़े रहे |

हालाँकि उन्हें अपने कुछ समकालीन अभिनेताओं के समान सुपरस्टार का दर्जा भले ही न प्राप्त हुआ हो, लेकिन अपनी मेहनत, लगन, सादगी और अभिनय को जीवंत बनाने कि क्षमता के चलते वह बॉलीवुड में अदाकरी के नए मायनें गढ़ने में जरुर सफ़ल साबित हुए |

इस दौरान शबाना आजमी के साथ किया गया उनका नाटक ‘तुम्हारी अमृता’ बेहद सफल रहा, जिसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस नाटक का 300 बार सफल मंचन हुआ |

हालाँकि किरदार कैसा भी हो, लेकिन फारूख साहब उन परिपूर्ण कलाकारों में से एक थे, जो अभिनय के हर मंच और छोटे-बड़े हर किरदार को पूरी वफादारी से निभाते थे | 

इस बात का एक उदाहरण यह भी हो सकता है कि दशकों तक मशहूर रही फिल्म ‘उमराव जान’ के पोस्टर के साथ ही साथ पूरी फिल्म में भी रेखा ही छाई थीं, लेकिन इसके बावजूद फारुख साहब ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया और नवाब सुल्तान के अपने किरदार की कुछ ऐसी छाप लोगों के दिलों में छोड़ी कि मानों बिन उनकी अदाकारी के फिल्म कि कल्पना तक करना मुश्किल सा लगता था |

एक बेहद कमल और सहज अभिनेता के तौर पर उन्होंने अपनी छवि कुछ ऐसी गढ़ी, कि वह जटिल किरदारों को भी बेहद सहजता से निभाने और उन्हें पर्दे पर असल जिंदगी के करीब और वास्तविक दिखाने में माहिर अभिनताओं में शुमार ही नहीं, बल्कि इस कला में निपुण एक बड़े चेहरे के रूप में उभरने में कामयाब रहे |

‘गमन’ और ‘नूरी’ जैसी फिल्मों के चलते भी उन्होंने बॉलीवुड में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया | हालाँकि अदाकारी के साथ ही साथ शायरी, सोशल वर्क, लिखना-पढ़ना, खाना पकाना भी उनके व्यक्तित्व के कई पहलूओं में से एक रहे और सबसे खास यह रहा कि उन्होंने इन सभी पहलूओं के प्रति काफ़ी संजीदगी और वफादारी प्रदर्शित की |

उन्होंने अपने चार दशकों के फ़िल्मी सफ़र में लगभग 40 फिल्मों में काम किया | और आज उनके 70वें जन्मदिवस पर मैं बस इतना ही कहना चाहूँगा कि भले ही उनको सार्वजानिक जीवन में एक सुपरस्टार जैसी उपाधि न मिल पाई हो, लेकिन अभिनय के मामले में वह किसी सुपरस्टार से भी काफी ऊंचे मुकाम पर बने रहे और ऐसी शख्सियत को WIC परिवार नमन करता है |

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