July 23, 2018
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‘मानवता’ के काम आने में विफ़ल साबित हो रहीं हैं आज की ‘प्रतिभाएं’: प्रणब मुखर्जी

  • by Ashutosh
  • March 24, 2018

एक बार फिर पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश में शिक्षा के मापदडों और उच्च शिक्षा के मायनों पर सवाल उठाया है | दरसल, प्रणब मुखर्जी ने कहा कि

” देश के तमाम क्षेत्रों में हर साल अनेकों प्रतिभाएं सामने आती हैं और लोग उनसे प्रभावित भी हो सकतें हैं, लेकिन इनमें से बहुत ही कम लोग ऐसे होंतें हैं, जो ऐसे मकसद और शोध क्षेत्र में प्रयास करते हैं जो मानवता के काम आये “

‘क्यूएस-इरा’ उच्च शिक्षा रेटिंग प्रणाली के शुभारंभ के अवसर पर उपस्थित हुए पूर्व राष्ट्रपति श्री मुखर्जी ने अपने अभिभाषण में कहा

” देश के डॉ. हरगोविंद खुराना, अमर्त्य सेन जैसे महापुरुषों को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन उन्हें भी यह सम्मान तब भी प्राप्त हो सका, जब उन्होंने देश से बाहर काम किया, जिससे कहीं न कहीं यह जाहिर होता है कि हम इन सन्दर्भों में विफल साबित हुए हैं, और हमें इस पर गहन रूप से विचार करना चाहिए “

इस अवसर पर पूर्व राष्ट्रपति मुखर्जी अपनी बात आगे बढ़ाते हुए यह भी कहा

” देश में आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी और मेडिकल के क्षेत्र में तैयार होने वाली प्रतिभाएं, अपनी प्रतिभा के आयामों को मात्र बड़ी-बड़ी कंपनियों, उद्योगों, कॉरपोरेट क्षेत्रों तक ही सीमित कर लेती हैं, हालाँकि इससे एक तरह की संतुष्टि कि प्राप्ति अवश्य ही हो सकती है, मानवता से जुड़े क्षेत्रों को इस प्रकार नज़रअंदाज़ करने से, समाज को ओर इनका योगदान कम होता जा रहा है, और शायद यही कारन है कि सीवी रमण के बाद किसी भारतीय को भारत के संस्थान में काम करते हुए नोबेल पुरस्कार नहीं मिला है “

प्रणब मुखर्जी के अनुसार, हमें इस तरफ जोर देना होगा कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली ऐसी प्रतिभाएं वैज्ञानिक बनें, शोध करें और ऐसी व्यवस्था तैयार करने में मदद करें, जो प्रत्यक्ष रूप से मानवता के काम आ सके |

इसी दौरान प्रणब जी ने यह भी कहा कि जब वह राष्ट्रपति थे तब वह शिक्षा से जुड़े हर मंच पर सिर्फ़ इसी बात पर जोर देते रहे कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए, और यह देश और समाज के बेहतर भविष्य के लिए सर्वाधिक जरूरी भी है |

इससे पहले भी प्रणब मुखर्जी कई सार्वजानिक मंचों से इस विषय पर बेबाकी से अपनी राय प्रस्तुत कर चुकें हैं | हाल ही में ही उन्होंने एक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए कहा था कि आईआईटी और आईआईएम से निकले पेशेवर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ‘सेल्समैन’ मात्र बनकर रह जाते हैं |

गौरतलब है कि भारत सबसे युवा देशों में से एक है, देश कि 65 प्रतिशत आबादी आज 35 वर्ष आयु वर्ग की है, और साल 2030 तक यह औसत आयु कि दृष्टि से 29 वर्ष हो जाएगी |

ऐसे में देश के पास यह एक सुनहरा मौका है कि वह कारोबार और रोजगार के साथ ही साथ समाज और मानवता के कल्याण कि ओर भी महत्वपूर्ण ध्यान दे और देश के प्रतिभाशाली युवा समाज के प्रति योगदान कि जरूरत और जिम्मेदारियों को समझें |

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