April 27, 2018
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जिस देश में ‘पत्रकारिता’ महफूज़ नहीं उसको लोकतांत्रिक कहना कितना उचित है?

  • by Ashutosh
  • March 27, 2018

कहते हैं, किसी भी सफ़ल लोकतंत्र की नींव बिना एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, भयमुक्त और ज़िम्मेदार मीडिया के नहीं रखी जा सकती है, और जब किसी देश का मीडिया को भी सरकारें और प्रशासन डराने और  धमकाने लगें, तो समझ जाइए, उस देश का लोकतांत्रिक अस्तित्व ख़तरे में हैं |

कुछ ऐसा ही दौर शुरू हो चूका है भारत में, जहाँ आज पत्रकारिता कि स्थिति, अपना ही मूल अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती नज़र आ रही है | हाल ही कि कुछ घटनाओं ने आज के दौर में पत्रकारिता की यथास्थिति का एक भयानक चेहरा सामने लाया है |

आपको बहुत तलाशने कि जरूरत नहीं, हाल ही में हुई तीन घटनाएं ख़ुद में ही इस दुर्दशा की कहानी को साफ़ बतलाती नज़र आती हैं |

दिल्ली पुलिस ने मीडियाकर्मियों से की मारपीट और छेड़छाड़

महिला पत्रकारों के साथ पुलिस द्वारा अभद्रता किए जाने के ख़िलाफ़ मीडियाकर्मियों ने दिल्ली पुलिस मुख्यायलय के बाहर किया प्रदर्शन (फोटो क्रेडिट: पीटीआई)

दरसल जेएनयू छात्र-छात्राओं एवं शिक्षकों द्वारा आयोजित किए गए विरोध प्रदर्शन मार्च के दौरान, जहाँ एक मीडियाकर्मी ने खुद के साथ पुलिस द्वारा छेड़छाड़ की शिकायत दर्ज करवाई, वहीँ एक दूसरे मीडिया सहभागी ने खुद से साथ मारपीट जैसे आरोपों को लेकर शिकायत दर्ज़ करवाई |

इस दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के मकसद से उन पर लाठी चार्ज भी किया और पानी की बौछार का भी इस्तेमाल किया गया, और इस दौरान मीडियाकर्मियों को भी पुलिस ने अपने निशाने पर लिया |

प्रदर्शन में शामिल एक पत्रकार के अनुसार,

“शुक्रवार को हुए यह घटना न केवल स्तब्ध करने वाली है, बल्कि डरावनी भी है, यह शहर में खुद क़ानून-व्यवस्था लागू करने के लिए ज़िम्मेदार पुलिस बल में अनुशासन की कमी को दर्शाती, और ख़ासकर यह स्थिति महिला संवाददाताओं के लिए बेहद बदतर है”

घटना कि रिपोर्टिंग करने गईं पत्रकार अनुश्री फड़णवीस के अनुसार वह इस प्रदर्शन कवर करने गई थीं, लेकिन पुलिस ने उनका कैमरा ही छीन लिया गया  और  साथ ही दिल्ली पुलिस के एक इंस्पेक्टर ने उन्हें अभ्रद तरीके से पकड़ा और घटनास्थत से जाने के लिए कहा था, जिसके विरोध में उन्होंने केस दर्ज करवाया |

इसके विरोध में विभिन्न मीडिया संगठनों से संबद्ध पत्रकारों ने शनिवार को दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया और आरोपी पुलिसकर्मियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई की मांग की |

इन पत्रकारों में शामिल विभिन्न मीडिया संगठनों के फोटो पत्रकारों ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर अपने-अपने कैमरों को रखकर अपना विरोध जताया |

Photo Credit: PTI

अब इस घटना के बाद दिल्ली में कानून व्यवस्था का ज़िम्मा कैसे लोगों पर है, आप खुद समझ लीजिये, और ऐसा प्रशासन किसी समाज को सुरक्षा प्रदान कर सकता है या तो मात्र एक परिकल्पना ही हो सकती है और ऐसे में अधिकारीयों को चाहिए कि ऐसे पुलिसकर्मियों के खिलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्यवाई कि जाए |

खनन माफिया और पुलिस की मिलीभगत का भांडाफोड़ करने वाले पत्रकार को ट्रक से कुचल कर मार दिया गया

बीते रविवार को मध्य प्रदेश के भिंड जिले में एक पत्रकार की ट्रक से कुचल कर हत्या करने कि खबर ने एक बार फिर मध्य प्रदेश कि शिवराज सरकार में अपराधियों के बढ़ते हौसलों को बेनकाब कर दिया | संदीप शर्मा पेशे से एक लोकल न्यूज चैनल पत्रकार थे और पिछले कुछ समय से रेत माफिया और पुलिस की मिलीभगत के खिलाफ लिख रहे थे |

कहा जा रहा है इस मामले में स्टिंग करने के बाद से ही उन्हें जान से मारने की धमकियाँ मिल रही थी, और यही नहीं बल्कि इसकी शिकायत के लिए संदीप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी पत्र लिख अपनी सुरक्षा की मांग की थी | लेकिन तब तो किसी ने कुछ नहीं किया, लेकिन अब शिवराज सरकार ने हमेशा की तरह भावविभोर होकर कड़ी से कड़ी जांच करवाने की बात कही है |

दरसल संदीप शर्मा सोमवार सुबह अपनी मोटरसाइकिल से जा रहे थे कि तभी भिंड कोतवाली से कुछ ही दूर एक ट्रक ने उन्हें कुचल दिया और आगे निकल गया | हालाँकि ट्रक द्वारा कुचले जाने की यह घटना सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई |

पुलिस ने अब तक इस मामले को एक सामान्य एक्सीडेंट दिखाकर ही मामला दर्ज कर लिया है, लेकिन संदीप शर्मा के भांजे ने इसको हत्या करार दिया है और साथ ही अटेर के एसडीओपी रहे इंद्रवीर भदौरिया को हत्या का जिम्मेदार भी ठहराया है |

अब इन घटनाओं के बाद देश में सरकारों का क्या रवैया है और उन्होंने कुछ ज़िम्मेदार और ईमानदार पत्रकारों को कितना असहाय बना दिया है, यह साफ़ जाहिर है, और ऐसे में अगर कोई मुख्यमंत्री आकर वही खोखले वादे दोहराए और दूसरी तरफ ऐसी घटनाएं लगातार होती रहें, तो ऐसे राजनेताओं को जरूरत है आत्ममंथन की और यह सोचने की कि पत्रकारिता को इतना असहाय न बनाए, कि जिस लोकतंत्र का फ़ायदा उठा वो सत्ता के नशे में चूर हैं, वही लोकतंत्र खुद समाज और देश के लिए घातक बन जाए |

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