June 19, 2018
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इस ‘राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस’ कुछ ऐसी चीज़ें जिन्हें ‘नहीं मिलनी चाहिए सुरक्षा”

  • by Ashutosh
  • March 4, 2018

आज यानि 4 मार्च का दिन देश में ‘राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस’ के रूप में जाना जाता है | यूँ तो इस दिन के मायने सुरक्षा के संबंध में मुख्यतः स्वास्थ्य और कारखानों में काम करने वाले कर्मचारियों की सुरक्षा तक ही सीमित किए गये हैं, लेकिन आज हम इसके मायनों की सीमा को बढ़ाने के साथ-साथ उसको एक विपरीत दिशा भी देना चाहते हैं |

जी हाँ ! सही सुना आपने विपरीत दिशा यानि इन मायनों से विपरीत हम आज उन देशव्यापी मुद्दों की बात करेंगें जिन्हें सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए | दरसल ये वो मुद्दें हैं जिनसे पूरा देश और देश का अधिकांश वर्ग परेशान है, लेकिन इन मुद्दों को किसी न किसी स्तर पर, किसी न किसी का संरक्षण या सुरक्षा प्राप्त है, और साथ ही इनमें से कई मुद्दों को जाने अनजाने में हम ख़ुद ही संरक्षण दे रहें हैं | 

तो आईये इस ‘राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस’ उन मुद्दों पर डाले एक नज़र, जिनकी सुरक्षा और संरक्षण का बहिष्कार होना चाहि |

1. रोजगार के अवसर को धांधली में बदल देने वाले कारणों को संरक्षण, 

हमारे देश में सबसे अधिक नाज़ किया जाता है, तो देश की युवा शक्ति पर | जी हाँ ! वही युवा शक्ति जिसके लिए हर राज्य और स्वयं केंद्र सरकारें हमेशा से रोजगार के अवसर बढ़ाकर उनको सशक्त बनाने का दावा करती नज़र आती हैं |

लेकिन क्या आपने कभी वर्तमान की स्थिति पर गौर किया है, या फ़िर कहीं हम आदी हो गए हैं, उन धांधलियों के, जो हर सरकारी नौकरी में अब मानों के चरण की तरह  जुड़ गयीं हैं, जैसे मानों लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और फ़िर मामला कोर्ट | हालाँकि इसके क्रम में बदलाव भी देखे जाते हैं, जैसे कई बाद लिखित के बाद ही कोर्ट इत्यादि |

खैर ! इस मुद्दें से आज पूरा देश और राज्यों में नौकरी देने के लिए ज़िम्मेदार हर राज्य आयोग जूझ रहा है | लेकिन हम मानों इस बात बात ही नहीं करना चाहते और शायद हम इस नए चरण के आदी होते जा रहें हैं |

दरसल यही तो असल रूप में रोजगार में इस अनियमितता और धांधली को मिलता संरक्षण या कहें तो सुरक्षा है, जो हम इसे प्रदान कर रहें हैं |

आप ख़ुद सोचिये हम में से सब इस चीज़ का विरोध करते हैं, लेकिन जब पैसों से सरकारी नौकरी पाने की बात आती है, तब अधिकतर लोगों का मन कहीं न कहीं डोलने लगता है, क्या ये इस बढ़ती समस्या को मिलता संरक्षण नहीं? 

हम आप किसी फ़िल्म पर इतिहास के साथ कथित छेड़छाड़ के आरोपों पर to एक जुट होकर सड़कों पर उतर आते हैं, लेकिन क्या कभी वाकई में हम ऐसे मुद्दों पर इतनी ही खिलाफ़त के साथ एक जुटता दिखाते हैं? क्या ये इस बेरोजगारी की बीमारी को मिलती सुरक्षा का कारण नहीं ? 

तो जनाब ! अगर ऐसे समस्या को ऐसे हम ही सुरक्षा प्रदान करते रहेंगें, तब शायद वो दिन दूर नहीं जब इस युवा शक्ति को धांधली और बेरोजगारी जैसे वायरस बीमार कर चुकें होंगें |

तो जरा सोचिये और बंद कीजिये इस बीमारी के कारण को सुरक्षा प्रदान करना |

2. सरेआम छेड़छाड़ को अनदेखा करने का संरक्षण

सड़कों पर बढ़ती छेड़छाड़ और मनचलों को नापाक करतूतों को सिर्फ़ इसलिए अनदेखा कर देना, क्यूंकि जिस महिला या लड़की के साथ यह हो रहा वह कोई अनजान है, इससे बड़ा अपराध शायद और कोई नहीं हो सकता | हालाँकि इस सवाल के बाद कई लोगों के मन में आता है तो क्या वह सीधे साधें लोग जो अपने किसी काम से बाहर निकले हों, ऐसे हर सड़क चलते मनचलों से भिड़ना शुरू कर दें? यह काम to पुलिस का है, लोग तो अपनी ही समस्या में उलझे रहते, और और परेशानी मोड़ क्यूँ लें?

इसका सिर्फ एक सरल का जवाब है, आज अगर आप किसी की मदद को आगे नहीं आयेंगें तो कल शायद आपके जानने वालों के साथ ऐसा हो, तब आप आसपास के चेहरों से कैसे उम्मीद कर सकतें हैं कि वह भी आपकी मदद को आगे आयें और ऐसे घिनौने कृत का विरोध करें | जनाब ! सड़कों पर ऐसे मनचले 3 या 4 ही होतें हैं, लेकिन किसी की एक आवाज़ भी उनको सबक सिखाने लायक तमाम भीड़ इक्कठा कर सकती है, लेकिन बस वहां से गुजर रहे आसपास के लोगों ने ये मन बना लिया हो कि अब से ऐसे सरेआम छेड़छाड़ जैसे घिनौने कृत को अनदेखा कर, उन मनचलों और उनके इस नापाक हौसलों को सुरक्षा व संरक्षण प्रदान नहीं करेंगें |

3. लोगों को आपस में बाँट अपना उल्लू सीधा करने वालों को संरक्षण

हम सबने हमेशा से पढ़ा और सुना है, अंग्रेजों ने ‘फूट डालों और राज करो” की नीति अपना कर हमें 200 सालों तक अपना गुलाम बनाए रखा और देश और लोगों को लूटते रहे | दरसल आज़ादी के कुछ ही सालों बाद से ये नीति फ़िर से राजनीति का अहम हिस्सा बन गई है | कोई भी पार्टी हो या उसका राजनेता, या कोई ढ़ोंगी बाबा, आज हम सब मानसिक रूप से आप में बाँट दिए गये हैं, और हमारे इस आपसी बँटवारे का फ़ायदा उठा, कई राजनेता अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं |

असल में राजनेताओं को तो हक है राजनीति गढ़ने का, लेकिन बात हमारी आपसी समझ की है, हम ख़ुद ऐसे लोगों की बातों में आकर कभी सड़कों पर धर्म और जाति की लड़ाई को निकल पड़ते हैं, तो कभी चुनावों में हमारे आपसी टुकड़े कर हमारा इस्तेमाल किया जाता है |

लेकिन क्या कभी आपने सोचा है, हम ख़ुद हमेशा बाँटने वाले मुद्दों पर ही सड़क में उतारते हैं, और अपनी बिखरी हुई एकजुटता का प्रदर्शन पर खुश हो जातें हैं | भले ही घर में या समाज में हमारे अपने ही भुखमरी, बेरोजगारी और उत्पीड़न के शिकार हो रहें हों, लेकिन उन मुद्दों पर हमारी बोलती अधिकतर सोशल मीडिया में महज़ पोस्ट तक ही सीमित हो जाती है |

जरा सोचिये जिस दिन इन महत्वपूर्ण और बुनियादी मुद्दों पर धर्म जाती भुला, सब एक होकर आवाज़ बुलंद करने लगे, tab ऐसी कोई भी सरकार नहीं, जो मूक बन कर बैठ सके, या इसको नज़रंदाज़ कर  सके |

लेकिन बस जरुरत है तो सिर्फ एक चीज़ की, की अब हम बाँटने वाले लोगों की बातों में आकर उनको संरक्षण और सुरक्षा देना बंद करें और अपनी सोच पर इंसानियत, सौहार्द और बुनियादी जरूरतों का रंग चढ़ाएं |

अंत में आपसे इतना ही निवेदन हैं, कि इस राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस पर इन नापाक और बेबुनियादी कारकों को सुरक्षा देना बंद करें और इंसानियत और सौहार्द के रंगों को फ़ीका न पड़ने दें |

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