July 22, 2018
  • facebook
  • twitter
  • linkedin
  • instagram

लालची अस्पतालों ने करोड़ों लेकर भी छीन ली एक बेटी से उसकी माँ: #MedicalKidnapping

  • by Ashutosh
  • June 16, 2018

एक वक़्त था जब समाज में अस्पतालों को काफ़ी इज्ज़त की नज़रों से देखा जाता था, लेकिन जब से यह पेशा महज़ व्यवसाय बनकर रह गया है, तब से न जाने कई ऐसी घिनौनी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने आज के समय के अनेकों प्राइवेट अस्पतालों का कला चेहरा सामने लाया है।

हाल ही में हुई एक घटना ने आज एक बार फ़िर ऐसे अस्पतालों को शर्मशार किया है, और अस्पतालों के नाम पर चल रहे व्यवसाय का क्रूर, घिनौना और मानवताहीन चेहरा सामने लाया है।

इस घटना को साझा किया है दिल्ली की रहने वाली पारुल भसीन वर्मा ने, जिन्होंने ऐसे ही लालची या कहें तो लूटेरे अस्पतालों के चलते अपनी माँ को हमेशा के लिए खो दिया।

दरसल, लीवर संबंधी बीमारी से जूझ रहीं पारुल की माँ क़रीबन 100 दिनों तक आईसीयू में रहीं, जिसके लिए तेलंगाना (हैदराबाद) के यशोदा हॉस्पिटल सिकंदराबाद और नई दिल्ली के बी.एल. कपूर हॉस्पिटल ने करीबन औसतन 1 लाख प्रतिदिन के हिसाब से 1.2 करोड़ का बिल थमाया। और इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह की पैसों के आगे इन अस्पतालों और इनके कई डॉक्टरों ने अपनी मानवता बेचते हुए, बिल न अदा करने पर बीच में ही इलाज़ रोकने की धमकियाँ भी दीं और ऐसी ही लालच और लापरवाही के चलते, पारुल की माँ की मृत्यु हो गयी।

बीती 2 जनवरी, 2018 में पारुल का माँ को अमोनिया अटैक और लीवर संबंधी शिकायतों के चलते नई दिल्ली के बी.एल. कपूर हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया, जहाँ 2 दिन बाद डॉक्टरों ने लीवर ट्रांसप्लांट करने की सलाह दी और इसका अनुमानित ख़र्च 18-20 लाख के क़रीब बताया।

जिसके चलते 9 जनवरी 2018 को उनको हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। इसके बाद परिवार ने लीवर ट्रांसप्लांट के लिए ज्योत्स्ना वर्मा नामक महिला से संपर्क किया, जो अपनी वेबसाइट प्रबंध करने का दावा करती हैं। पारुल के मुताबिक 16 जनवरी को ज्योत्स्ना ने तेलंगाना (हैदराबाद) के यशोदा हॉस्पिटल सिकंदराबाद में एक मृत रोगी द्वारा लीवर के उपलब्ध होने संबंधी जानकारी दी और इस जानकारी को साझा करने के लिए ज्योत्स्ना ने करीब 1 लाख रूपये लिए।

जिसके बाद 16 जनवरी को ही पारुल के परिवार वाले हैदराबाद के लिए रवाना हुए, जहाँ जाकर यशोदा हॉस्पिटल सिकंदराबाद जाकर उन्हें बताया गया की लीवर ट्रांसप्लांट का कुल ख़र्च क़रीब 27 लाख तक होगा।

जिसके बाद 5 फ़रवरी 2018 को पारुल का माँ का सफ़ल लीवर ट्रांसप्लांट हुआ। लेकिन 8 फ़रवरी को लंग इन्फेक्शन के चलते उन्हें फ़िर से वेंटीलेटर में रखा गया, जहाँ वो करीबन 30 दिनों तक रहीं, इस दौरान अस्पताल ने प्रतिदिन के 1 लाख रूपये लिए, जिसके चलते यशोदा अस्पताल ने उन्हें तब तक का 60 लाख का बिल थमाया।

करीब 10 मार्च 2018 तक अपनी सारी जमा पूंजी खत्म हो जाने पर पारुल के पिता ने पर्याप्त ऋण लिया, हालाँकि पैसों के खत्म होने की बात पता चलने पर अस्पताल परिवार वालों पर मरीज़ को जल्द से जल्द डिस्चार्ज करवा, वापस ले जाने का दबाव बनाने लगा। और अस्पताल के अकाउंट डिपार्टमेंट के प्रवीण नामक व्यक्ति ने धमकियाँ देने शुरू किया कि, यदि उन्होंने पैसे नहीं दिए तो वह मरीज़ का इलाज़ बीच में ही रोक देंगें। जिसके चलते परिवार को वापस दिल्ली के बी.एल. कपूर हॉस्पिटल में मरीज़ को भर्ती करवाना पड़ा। 

ऋण में होने के कारण परिवार ने अपस्ताल की बजाये, बाहर से सस्ते में दवाइयाँ खरीदने के फ़ैसला किया। 5 अप्रैल तक मरीज़ की हालत में सुधार न होने के कारण, डॉक्टरों ने परिवार पर दबाव बनाया कि वह मरीज़ को आई.सी.यू से सीधे घर ले जाए।

लेकिन 7 अप्रैल को वापस साँस लेने में तकलीफ के चलते पारुल की माँ को वापस बी.एल. कपूर हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया, जहाँ अस्पताल ने शर्त रखी कि वह मरीज़ को भर्ती करेंगे, यदि दवाइयाँ उनके अस्पताल के प्रीमियम स्टोर से ली जायेंगी, (जहाँ 2-3 गुना दाम वसूलें जाते हैं)। इस दौरान अस्पताल ने 1 लाख प्रतिदिन का चार्ज लिया और साथ ही डॉक्टरों ने भी परिवार के साथ काफ़ी बुरा व्यवहार किया। पारुल के अनुसार, ऐसे बुरा व्यवहार करने वालों में मुख्य रूप से अस्पताल में लीवर ट्रांसप्लांट टीम के हेड डॉ. संजय सिंह नेगी रहे।

इस दौरान 20 अप्रैल को पारुल की माँ को जौंडिस होने का पता चला, जिसके चलते यशोदा हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने दिल्ली के डॉक्टरों को मरीज़ के लीवर में स्टेंट (ख़ास तौर पर डिज़ाइन ट्यूब) इनस्टॉल करने की सलाह दी, ताकि मरीज़ के पूरे शरीर में इन्फेक्शन फैलने से रोका जा सके। लेकिन नई दिल्ली के  बी.एल. कपूर हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने वीकेंड सेलिब्रेट करना ज्यादा जरूरी समझा और 23 अप्रैल की दोपहर तक के लिए स्टेंट इनस्टॉलेशन को टाल दिया। और इस देरी की वजह से उनके पूरे शरीर में इन्फेक्शन फ़ैल चुका था, जो मरीज़ के मल्टीप्ल ऑर्गन फेलियर का कारण बना।

इसके बाद भी 24 अप्रैल को डॉक्टरों ने साड़ी उम्मीद खत्म होने के बाद भी करीब 7 मई तक एक मृत सामान शरीर में महज़ पैसे कमाने के लिए प्रतिदिन मरीज़ का डायलिसिस जारी रखा और परिवार को महंगी दवाइयों और उपचार विधि के लिए मजबूर किया।

हालाँकि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से 7 मई को पारुल की माँ ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

करीब इन चार महीनों के दौरान पारुल के परिवार ने महज़ लालची डॉक्टरों, अस्पतालों के चलते जो जो मानसिक और आर्थिक मुसीबतों का सामना किया, वह सिर्फ वह परिवार ही समझ सकता है, जिसने ऐसे लूटरों के चलते अपने परिवार की एक अहम सदस्य खो दिया।

अब सवाल है उस समाज से, उस सिस्टम से जो ऐसे लूटरें और लालची अस्पताल रुपी दुकानों को चलने देता है, जिनके लिए इंसान और इंसानियत दोनों सिर्फ अधिक से अधिक पैसे कमाने का जरिया मात्र हैं। WIC परिवार अपील करता है पूरे समाज से कि ऐसे लूटेरों से सावधान रहें और हम गुजारिश हैं हमारे देश की सरकारों से की देश में अस्पतालों के नाम पर हो रहे, ऐसी जबरजस्ती की उगाही और यातनाओं से देश के लोगों को बचाएँ और ऐसे अस्पतालों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाई करें, जो महज़ पैसों के आगे अपनी इंसानियत तक बेच देते हैं, और दूसरे लाचार इंसानों की मज़बूरी का फ़ायदा उठा, उन्हें मानसिक और आर्थिक रूप से निचोड़ देते हैं।

आज न जाने कितने परिवार रोज अनेकों ऐसे लालची और  लूटेरे अस्पतालों और  डॉक्टरों का शिकार होते हैं, और न जाने कितने लोग जो ऐसे लूटेरों की जेब नहीं भर पाते, वह महज़ पैसों के आभाव में अपनों को खो देते हैं।

आइये कोशिश करें इन सस्थाओं के प्रति जिम्मेदार लोगों तक एक ऐसा पैगाम पहुँचाने कि जिनसे इन्हें पता लगे, कि हमें समाज के लिए असल में सेवा भाव और इन्सानियत रखने वाले अस्पताल और डॉक्टर चाहिए, ऐसे लूटरे नहीं, जिनके चलते यह सम्मानजनक पेशा दिन प्रतिदिन इतना बदनाम हो रहा है।

#StopMedicalKidnapping

Previous «
Next »

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *