July 17, 2018
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45 साल बाद फिर से देश में सुनाई देने लगी “चिपको” की गूंज: #ChipkoRe #SaveAarey

  • by Ashutosh
  • March 26, 2018

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार।
मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार।

ये वो पंक्तियाँ हैं, जिनकी गूंज 1973 में उत्तर प्रदेश के चमोली जिले से शुरू होकर, एक दशक के अन्दर पूरे उत्तराखण्ड क्षेत्र में भी सुनाई देने लगी थीं, और इन पंक्तियों का आधार था ‘चिपको आन्दोलन’ | दरसल भारत के उत्तराखण्ड राज्य (जो की तब उत्तर प्रदेश में ही शामिल था) में किसानो ने वृक्षों की कटाई का विरोध करने के मकसद से इस आंदोलन कि शुरुआत की, वह मुख्यतः वन विभाग के ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई का विरोध कर रहे थे और उन वनों पर अपना परम्परागत अधिकार साबित करने का प्रयास कर रहें थे |

लेकिन उस वक़्त भी चिपको महज़ एक क्षेत्र में सिमटे आंदोलन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि संपूर्ण देश में पर्यावरण और उसके मुख्य अंग अर्थात् ‘पेड़ों’ कटाई के विरोध में देश भर में फैलने वाला एक जागरूकता मिशन बन गया था |

उस वक़्त इस आन्दोलन कि नीव भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् सुन्दरलाल बहुगुणा, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा श्रीमती गौरादेवी ने डाली, लेकिन किसानों और आम जन-मानस ने भी आगे आकर इस आंदोलन को सफ़ल बनाते हुए, इसकी भावना को जन-जन तक पहुँचाया और इस आंदोलन को एक देशव्यापी मुहीम का स्वरूप दिया | और देखते ही देखते यह आन्दोलन पूर्व में बिहार, पश्चिम में राजस्थान, उत्तर में हिमाचल प्रदेश, दक्षिण में कर्नाटक और मध्य भारत में विंध्य तक फैला गया था |

इस आंदोलन का प्रभाव यह रहा कि इसने केंद्रीय राजनीति के एजेंडे में पर्यावरण को एक प्रमुख मुद्दा बना दिया और कहा जाता है कि भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको की वजह से ही संभव हो पाया |

इतना ही नहीं, बल्कि तब उस वक़्त की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने प्रदेश के हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 वर्षों के लिए रोक तक लगा दी थी |

एक बार फिर से देश में चले ‘चिपको’

लेकिन आज 45 वर्ष बाद एक बार फिर से देश को जरूरत है एक साथ खड़े होकर चिपकों आंदोलन कि उस भावना को अपने और सभी के दिलों में फिर से जिन्दा करने की |  कुछ सालों से शायद मीडिया और हमारे समाज का ध्यान इस ओर न गया हो, लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगा कि कुछ सालों से महाराष्ट्र के मुंबई स्थित ‘आरे वन’ (Aarey Forest) को विकास के नाम पर कटने से बचाने के लिए ‘चिपको’ के समकक्ष एक मुहीम चलाई जा रही है |

दरसल सरकार वहाँ मेट्रो योजना के अंतर्गत पेड़ों को काट कर, वहाँ मेट्रो संबंधी कार्य करने का प्रयास कर रही है, लेकिन शायद सरकार यह भूल गई कि मुंबई के मौसम के मिजाज को तय करने में अहम भूमिका निभाने वाले इस वन को काट कर, वह क्षणिक विकास कि नीव पर सर्वांगीण विनाश को आमंत्रित कर रही है | 

पर्यावरण कि गोद में रहने वाले हजारों परिवारों को आरे से दूर बहुमंजिला कमरों में सिमटा दिया गया है और यहाँ तक कि सरकार ने आरे को वन मानाने से भी इंकार कर दिया है | हालाँकि यह मामला अदालत में लंबित है, लेकिन अब बीते कुछ समय से आम लोगों के साथ ही साथ कई मशहूर हस्तियों ने भी ‘आरे वन’ को बचाने कि मुहीम में अपना योगदान प्रारंभ किया है और अब वह खुल कर इसका विरोध करने के साथ ही, सरकार से अनुरोध कर रहें हैं कि वह मेट्रो के रास्ते के लिए कोई और उपाय तलाशे |

हालाँकि यह सिर्फ़ मुंबई का हाल नहीं, देश भर में न जाने कितनी जगहों पर पेड़ों को इतनी सरलता से कटा जा रहा है, वनों का नामोनिशान मिटाया जा रहा है, जैसे मानों कि इंसानों को यह पता ही नहीं कि बिना पेड़ों के शायद हमारा वजूद ही न रहे | विकास और शहरीकरण के इस दौर में जरूरत है देश भर में हर कोने में फिर से ‘चिपकों’ को जगाने की और यह बात ध्यान रखिये जब तक पर्यावरण के ये बहुमूल्य तोहफे हैं, शायद हमारा अस्तित्व भी तभी तक है, तो किसी और कि खातिर नहीं, बल्कि खुद कि खातिर, आने वाली पीढ़ियों कि खातिर, पेड़ पौधों को कटने से बचाएँ और एक ऐसे सोच और मुहीम कि शुरुआत करें, जिससे पेड़ों कि रक्षा सरकार समेत सभी लोगों कि प्राथमिकताओं में शामिल हो सके |     

 

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