February 21, 2018
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शर्मनाक: सियासी आलोचनाओं के बीच कितना जायज़ है ‘पकौड़े वालों का मज़ाक’ बनाना?

  • by Ashutosh
  • February 6, 2018

एक निजी चैनल पर इंटरव्यू के दौरान देश में रोजगार के हालातों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गया ‘पकौड़े बेचने’ संबधी बयान काफ़ी तूल पकड़ता दिखाई पड़ रहा है | देश का शिक्षित बेरोजगार वर्ग जहाँ इस बयान से आहत नज़र आ रहा है, वहीँ कल राज्यसभा में भाषण के दौरान बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह प्रधानमंत्री के इस बयान पर सफ़ाई देते नज़र आए |

मैं यहाँ किसी भी व्यक्ति विशेष के बयान का बचाव या उस पर देशभर में मिल रही प्रतिक्रिया का समर्थन नहीं करने की कोशिश कर रहा हूँ | मेरी कोशिश है तो सिर्फ इतनी कि इन सियासी बयानों के बीच, कहीं हम मेहनतकश कामगारों के जीविका कमाने के साधनों का मज़ाक बना, उनके दिलों को आहत तो नहीं कर रहे?

मेरा यह सवाल सिर्फ किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति विशेष से नहीं है, बल्कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर इस बयान को लेकर चर्चा कर रहे उन सभी देशवासियों से है, जो चर्चा के दौरान जाने अनजाने में ‘हुनरमंद और ख़ुद से जीविकायापन करने वाले कुछ देशवासियों के दिलों को आहत कर रहे हैं |’ 

दरसल हाल का माहौल यह है कि किसी के बयान के साथ इतेफ़ाक न रखने पर हम इस कदर उस बयान आलोचना करने लग जा रहें हैं कि यह भूल जा रहे, इस आलोचना से बयान देने वाले को फर्क पड़े न पड़े, लेकिन मेहनत से पकौड़े बेच अपने परिवार का पेट भरने वालों की मेहनत का मज़ाक जरुर बन रहा है |

इस बयान की आलोचनाओं के दौरान टीवी चैनलों पर यह कहके हँसना कि क्या पकौड़े बेचना भी कोई रोजगार है? यह कितना जायज़ है? ठीक है ग्रेजुएशन कर चुके शिक्षित वर्ग के लिए यह पीड़ा का विषय हो सकता है, कि उन्हें सरकारों से उनके लिए अन्य स्तरों के रोजगार की दरकार होती है |

लेकिन जनाब! छात्रों की भावनाओं को प्रकट करने की आड़ में टीवी चैनलों पर बैठ, ‘पकौड़े वालो की भिखारियों से तुलना करना’, ‘उनकी जीविका के साधन का उपहास करना’ क्या वाकई यही कहना हैं आपका? असल में इस तरह की प्रतिक्रियाओं से किसी राजनीतिक दल को फ़र्क नहीं पड़ता जनाब! फ़र्क पड़ता है या कोई आहत होता है, तो वह अपना ही कोई देशवासी है, जो इज़्ज़त और मेहनत के साथ उसी ‘पकौड़े’ को बेच अपने परिवार का पेट पाल रहा है |

राजनीतिक मतभेद को न बनाए आपसी उपहास का जरिया,

हो सकता है कि शिक्षित वर्ग के लिए रोजगार की बात करने पर, प्रधानमंत्री मोदी से हम सबकी और आपकी अपेक्षाएं किसी एक अलग आयाम के जवाब की रहीं हों | और ऐसे जवाब को सुन, आप उनसे इतेफ़ाक न रखें, और शायद आप किसी भी अन्य राजनीतिक दल या किसी व्यक्ति की विचारधारा से इतेफ़ाक न रखते हों | इस बात में कोई बुराई नहीं, बल्कि मैं तो इसको ही लोकतंत्र की खूबसूरती कहूँगा |

लेकिन इन राजनीतिक बयान बाजियों के बीच कोशिश करें कि समर्थन या अपनी आलोचना व्यक्त करने के कुछ ऐसे तरीकों को अपनाने की, जो हमारे आपस में ही किसी को अपनी ही नज़रों पर शर्मिंदा होने पर मजबूर न करें |

एक युवा होने के नाते मैं ख़ुद रोजगार को लेकर छात्रों में व्याप्त क्रोध को समझता हूँ, और उसका सम्मान करता हूँ, देश की कई सरकारी और निजी संस्थाएं आज पढ़ाई के साथ-साथ नौकरियों को लेकर भी अब हमारे भविष्य का मजाक बनाने में अमादा हैं, जिसके प्रति सभी छात्रों को काफ़ी रोष है और वह काफ़ी आहत हैं | लेकिन कहीं इसी तरह अब हम भी अपनी भावनाओं को प्रकट करने के तरीकों से जाने अनजाने में किसी अपने ही किसी भाई-बंधु की मेहनत का मज़ाक तो न नहीं उड़ा रहें हैं? भले ही वह हमसे कम शिक्षित हो, लेकिन किसी के रोजगार और जीविका के साधन का उपहास बनाना, क्या यह भी ग़लत नहीं?

और जनाब! आपको मैं यह भी याद दिलाना चाहूँगा, यह पकौड़े बेचने वाले वही लोग हैं जो बड़े-बड़े शहरों में अपने घरों से दूर नौकरी कर रहें पेशेवरों का कई बार इन्हीं पकौड़ों से पेट भरते हैं | मेरी बस इतनी गुजारिश है कि आलोचनाओं के दौर में ऐसे किसी का मज़ाक न बनाएं, कि जब कभी दोस्तों के साथ इन्हीं ठेलों में चाय और पकौड़ों का आनंद लेने जाए, तो उस पकौड़े वाले की कड़ी मेहनत और ईमानदारी को देख, आप (उनका मज़ाक बनाने वाले अपने बयान की वजह से) ख़ुद से ही नज़रें न मिला सकें |          

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