August 16, 2018
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“इंसान को ‘जीने के अधिकार’ के साथ ही ‘मरने’ का भी हक़”: सुप्रीम कोर्ट

  • by Ashutosh
  • March 10, 2018

सुप्रीम कोर्ट ने कल एक बड़ा फ़ैसला सुनाते हुए, बीते कई समय से समाज के पटल पर चल रही एक व्यापक बहस और असमंजस कि स्थिति पर विराम लगा दिया है | दरसल, शुक्रवार को देश कि सर्वोच्च अदालत ने ‘इच्छा मृत्यु’ की इजाजत दे दी है |

सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की बेंच ने इस संवेदनशील मामले में एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए, मौत की कगार पर पहुंच चुके शख्स को वसीयत के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का हक प्रदान किया है | लेकिन हम आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर यह भी कहा है कि ‘लिविंग विल’ पर भी मरीज के परिवार की इजाजत जरूरी होगी तथा साथ ही इसके लिए विशेषग्य डॉक्टरों की टीम भी मंजूरी होनी आवश्यक होगी, जिसको यह तय करना होगा कि मरीज का अब ठीक हो पाना नामुमकिन सा है |

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर दूरगामी रूप से समाज में अब दिखने वाला है यह तो लाज़मी है, और इस पर स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि,

“सम्मान से मरना मौलिक व्यक्ति का अधिकार है”

लिविंग विल का स्पष्ट रूप से मतलब यह है कि अब कोई व्यक्ति पहले से ही यह लिखकर रख सकता है कि यदि किसी भी बीमारी के कारण वह ऐसी अवस्था में आ जाता है जहाँ से उसका पुनः स्वस्थ होना लगभग नामुमकिन सा हो जाए, तो ऐसे में वह जीवन रक्षक उपकरणों को हटाने का निर्देश दे सकता है |

वहीँ आपकी जानकारी के लिए हम आपको बता दें सक्रीय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु में यह अंतर होता है कि सक्रीय इच्छामृत्यु में मरीज की जान बचाने के प्रयास कियें जाए, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु में मरीज की जान बचाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया जाता |

दरसल कॉमन कॉज नामक एनजीओ ने ‘लिविंग विल’ का हक देने की मांग को लेकर 2005 में एक पिटीशन दायर कि थी, जिसमें उन्होंने अनुरोध किया था कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को लिविंग विल बनाने का अधिकार दिया जाए |

इस पर क्या था चीफ जस्टिस का रुख?

इस मामले में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था कि,

” हम इस बात का ध्यान रखेंगें कि इच्छामृत्यु में वसीहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज कि जाए, जहाँ दो स्वतंत्र गवाह भी मौजूद हों, कोर्ट इस मामले में पर्याप्त सेफगार्ड देगा, इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए “

पहले भी सामने आ चूका है ऐसा मामला

शायद आपको याद हो, 2011 में अरुणा शानबाग मामले में कोर्ट ने निष्क्रिय अवस्था में जीवनरक्षक उपकरण हटाने कि अनुमति दी थी | वहीँ तब केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आधार पर सक्रिय इच्छामृत्यु पर सहमति देने को तैयार थी |

हालाँकि कल आये इस फ़ैसले को अभी व्यापक रूप से समझने कि जरूरत है, क्यूंकि ऐसी कई चीज़ें हैं जो इसके खिलाफ़ भी सोचने को मजबूर करती हैं, जिसमें इच्छामृत्यु देने वाले डॉक्टरों पर पड़ने वाला मनोवैज्ञानिक दवाब, और पारिवारिक मनोस्थिति महत्वपूर्ण आयाम हैं, क्यूंकि ऐसे मामलों में भावात्मक पहलुओं को पूरी तरह से नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता | 

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