June 19, 2018
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बनारस: धार्मिक आस्थाओं और मौज-मस्ती के रंगों में लिपटा शहर

  • by Ashutosh
  • December 28, 2017

कहतें हैं,

                        “ जहाँ खाक़ भी पारस है, वह जिंदा शहर बनारस है ”

बनारस’, जो न सिर्फ़ एक शहर है, बल्कि जीने का एक अंदाज़ भी है…एक एहसास है उस हवा का जहाँ आरती, मंदिर की घंटियों और भजन के बीच लोगों की मौज-मस्तियों के ठहाकें भी घुलें नज़र आतें हैं।

बनारस में आपका स्वागत है (Credit: अपना बनारस)

इस शहर को पहचान देने में जितनी भूमिका इसके धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहरों की है, उतनी ही ‘बनारस के लोगों‘ की भी।

‘बनारस’ या ‘काशी’ को महादेव अर्थात् भगवान शिव की नगरी महज़ यूँ ही नहीं माना जाता। दरसल, शिव जी के बारे में कहा जाता है, जिनता विनाशक स्वरूप उनके क्रोध का था, वह उतना ही बेईंतहा प्यार भी प्रदर्शित करते थे और असल में बनारसी लोगों में भी इस अंदाज़ की झलक साफ़ देखने को मिलती है। शायद इसलिए कहतें हैं,

” मैं महादेव कहूँ, तुम बनारसी समझना “

एक पल के लिए आपको धार्मिक और तमाम आस्थाओं का प्रतीक माने जाने वाले इस शहर की ठेठ बनारसी भाषा हैरान जरुर कर सकती है, लेकिन यकींन मानिये जनाब! यह ख़ास अंदाज़ यहाँ बड़े प्रेम और आदर से स्वीकारा जाता है।

और ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता कि आप बनारस के रंगों की तलाश में निकलें और बनारसियों और उनकी बोली को नज़रंदाज़ कर सकें। असल में बनारसी बोली और घाटों के बिना बनारस के रंग को फ़ीका ही कहा जा सकता है।

बनारस के घाटों की सुबह या कहें “सुबह-ए-बनारस” जहाँ एक तरफ़ आपके दिलों में तमाम भीडभाड़ के बीच भी एक शांति का एहसास कराती है, वहीँ दिन की शुरुआत से ही यहाँ की गलियों में कचौड़ी, जलेबी और भी न जाने कितने तरह के नाश्तों के साथ चाय के बीच तीख़े नोंकझोकों के सिलसिले शुरू हो जातें हैं, और यह बहसें देखते ही देखते न जाने कब ठहाकों का रूप ले लेती हैं।

वहीँ शाम होते ही शहर के घाट मंत्रों, आरती, शंखनाद और घंटियों की ध्वनि के बीच प्रभु की आस्था में समर्पित होते नज़र आने लगतें हैं, और यह दृश्य सिर्फ़ देशवासियों को ही नहीं, बल्कि विदेशी पर्यटकों को भी मानों ख़ुद में बांध सा लेता है।

बनारस की सबसे ख़ास बात यह है कि सिर्फ़ यह कहना की “मैंने बनारस देखा है”, काफ़ी नहीं , असल में अगर आप इस शहर में हैं तो बेशक आपने यहाँ के जायकों, लोगों और हवा में मौजूद उस धार्मिक एहसास के जरिये कहीं न कहीं इस शहर को महसूस जरुर किया होगा।

सिर्फ़ कॉलेज के मायनों तक ही नहीं सिमटा है ‘बी.एच.यू.’

‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय’ या ‘बी.एच.यू.’ यूँ कहें तो एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है, लेकिन बनारस के इतिहास को सँजोने के साथ ही साथ यह आज शहर के मिज़ाज को तय करने में भी काफ़ी अहम भूमिका निभाती नज़र आती है। दरसल, शहर में घाटों की बात की जाए या गलियों में मशहूर दुकानों की, आपको लगभग हर जगह बी.एच.यू. के छात्र मौजमस्ती करते नज़र आयेंगें।

बनारस में पहचान का मोहताज़ नहीं है ‘अस्सी घाट’

बनारस में वैसे तो घाटों की भरमार है, जैसे मणिकर्णिका घाट, तुलसी घाट, हरिश्‍चंद्र घाट, शिवाला घाट इत्यादि, लेकिन ‘अस्सी घाट’ की बात ही कुछ और है। यहाँ आकर आप इसकी खूबसूरती ही देखते रह जायेंगें। घाट किनारों पर बने पक्के मकान और वहां रहने वाले लोगों की जीवनशैली ख़ुद में बिना कुछ कहे ही बनारस की व्याख्या करती नज़र आती है। हालाँकि यह घाट और भी कई वजहों से भी जाना जाता है, जिनमें से एक है भगवान शिव का प्रसाद, जिसको यहाँ आए पर्यटक माना नहीं कर पाते 😉

रात में भी जागने लगा है शहर,

धीरे-धीरे यह शहर भी रात में जगाने की आदत डालने लगा है। बात करें रातभर ”लंका बाज़ार’ में खुली रहने वाली चाय की दुकानों की या फ़िर अस्सी घाट में दिन भर की पढ़ाई से थके छात्रों की मस्ती की, शहर ने इन सभी को स्वीकारना शुरू कर दिया है। हालाँकि यह शैली बनारस में इतनी जगह इसलिए भी नहीं बना पा रही है, क्योंकि बनारस का असली रंग ही वहाँ की भीडभाड़ और चहलपहल से है, और ख़ास तौर पर जब दुकानों से लेकर घाटों तक में आपको कुछ बनारसी लोग और उनसे बात करने का मौका न मिले, तब तक बनारस में होने का असली एहसास कहाँ मिल सकता है।

धार्मिक सौहार्द का प्रतिबिंब है बनारस,

हिंदू धर्म की पवित्र स्थली माने जाने वाले बनारस की इस धरती को कभी भी किसी धर्म, मज़हब, जाति या बोली के आधार पर बंटते हुए नहीं देखा गया। यहाँ आपको शिवालयों की घंटियाँ और मस्जिदों की अज़ान दोनों ही सामन रूप से शहर का हिस्सा बनती नज़र आएगीं।

इस शहर ने जहाँ एक ओर पदम् विभूषण सम्मानित कथक गुरु बिरजू महराज जी को एक अलग पहचान दी, वहीँ भारत रत्न सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई की गूंज का आगाज़ बनारस की ही गलियों से हुआ।

बनारस की खूबसूरती को शब्दों में पिरों पाना इतना आसान नहीं, इस शहर ने आज भी जहाँ अपनी धार्मिक विरासत को अपनी जीवनशैली में जिंदा रखा है, वहीँ साथ ही साथ यह शहर किसी अन्य क्षेत्र में भी दूसरे शहरों की तुलना में पीछे नज़र नहीं आता।

काशी विश्वनाथ मंदिर’ से लेकर ‘दशाश्‍वमेध घाट’ हो या ‘बनारस की गलियों और दुकानों’ से लेकर स्वतः ‘शहर के लोग’, एक बार यहाँ आने के बाद, इन सब का एहसास आपको बनारस को कभी भूलने नहीं देगा यह लाज़मी है, और इसलिए हम आपके लिए लेकर आयें हैं बनारस के रंगों को दर्शाती कुछ तस्वीरें जो शायद आपके मन में भी एक बार बनारस आने की ललक जरुर पैदा कर देंगी

Credit: अपना बनारस

बनरसी गलियाँ (Credit: अपना बनारस)

काशी विश्वनाथ मंदिर (Credit: अपना बनारस)

लंका या बी.एच.यू. द्वार (Credit: अपना बनारस)

घाट की एक झलक (Credit: अपना बनारस)

Credit: अपना बनारस

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