August 16, 2018
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सवाल: असल मुद्दों से कौन भटक रहा है, ‘सरकार’ या ‘हम’?

  • by Ashutosh
  • February 8, 2018

देश के आज के माहौल से हम सब वाकिफ़ है | मैं यहाँ इस पर चर्चा नहीं करना चाहता कि माहौल कैसा है, क्यूंकि एक आदर्श समाज के नजरिए से आज का माहौल काफ़ी विपरीत है, जिसमें हम असल और बुनियादी जरूरतों के मुद्दों से भटकते नज़र आ रहें हैं |

कुछ धर्म और जातिगत हिंसाओं, बलात्कार, हत्या और अनेक दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं से पूरा देश पीड़ित है | लेकिन क्या वाकई देश का माहौल हद से अधिक ख़राब है?

दरसल मेरा मानना है, कि देश की दशा आज भी उतनी ख़राब नहीं, जितनी ख़राब  हमारी प्राथमिकताएं होती जा रहीं हैं | मैं यहाँ किसी सरकार या प्रशासन या राजनीतिक दल को चिन्हित नहीं कर रहा, मैं यहाँ प्रश्न उठाना चाहता हूँ, इस समाज पर और हम सब पर |

जरा सोचिये क्या वाकई अब देश में लोग धर्म जाति को लेकर इतना बंट गए हैं? क्या आज अजनबी इंसानियत के चलते एक दूसरे की मदद करना बिल्कुल भूल गयें हैं?

मेरे ख्याल से ऐसा नहीं है | आज भी देश में राजनीतिक पार्टियों और लोगों से परे एक ऐसा समाज व्यापत है, जहाँ लोग किसी महिला के साथ सरेआम छेड़खानी होने पर आवाज़ उठाना जानते हैं, जहाँ आज भी ट्रेनों में बुजर्गों को मदद करने के लिए कई हाथ आगे आते हैं, जहाँ आज भी कई लोग ख़ुद की कमाई से अपने साथ-साथ कुछ गरीबों का भी पेट भरने में विश्वास रखते हैं, जहाँ सड़कों पर किसी छोटी या बड़ी दुर्घटना का शिकार हुए लोगों के लिए आज भी कई राहगीर रुक, मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाना अपना कर्तव्य समझते हैं और न जाने ऐसे कितने उदाहरण आज भी देखने को मिलते हैं, जिनसे ये तो साबित हो जाता है कि देश में इंसानियत आज भी जिंदा है, जरुरत है तो बस उसकी ओर लोगों का ध्यान लाने की, लोगों को उसका एहसास दिलाने की |

हालाँकि मैं इन बातों से इंकार नहीं करता कि धर्म-जाति को लेकर हिंसक मामले बढें हैं, देश में बलात्कार जैसे नीच दुष्कर्मों में इजाफ़ा है | लेकिन इन सब घटनाओं का मुख्य कारण कौन हैं, सरकारें, प्रशासन या हम?

सरकारों और प्रशासन को इसके लिए अवश्य ही कदम उठाने चाहिए और यह उनका दायित्व भी है | लेकिन मेरे ख्याल से हम भी ऐसी घटनाओं के लिए समान तौर पर ज़िम्मेदार हैं |

आज क्यूँ देश में धर्म-जाति के नाम पर चर्चा करने वालो को हम तव्वजों देते हैं?, क्यूँ टीवी में ऐसे मुद्दों में होती चर्चाओं को हम बड़े मन से सुनने बैठ जातें हैं?, क्यूँ इस देश में एक फ़िल्म में दिखाए गए इतिहास का विषय तो बहुत आहत करता है, लेकिन समाज में हो रहे बलात्कारों के खिलाफ़ यही एकजुटता और हमारा इतना ही सहयोग क्यूँ दिखाई नहीं पड़ता? क्यूँ हम सिर्फ ऐसे मुद्दों में मनोरंजन तलाशने लगें हैं, जो इस देश को बाँटने का काम करते हैं, और धर्म-जाति आधारित विभाजन के विषय को जब सिरे से एक सुर में इसकी खिलाफ़त कर नाकारा जा सकता है, तो क्यूँ हम टीवी पर दिखाई जाने वाली ऐसी डिबेटो में रूचि दिखाते हैं?

मेरे हिसाब से उपरोक्त सब वही सवाल हैं, जो किसी हद तक आदर्श समाज की परिकल्पना करने वाले और उसका ख़्वाब देखने वाले हर व्यक्ति को ख़ुद से पूछना चाहिए |

देश में रोजगार, महँगाई, ग़रीबी क्या ये सब खत्म हो गयें हैं, क्या हम एक आदर्श देश बन गयें हैं? नहीं न | तो कहाँ हैं ये मुद्दें? क्यूँ धर्म जाति के मुद्दों के आगे इन मुद्दों को लेकर आज हमारा उत्साह फ़ीका पड़ता नज़र आने लगा है | इस पर तो किसी सरकार या राजनीतिक पार्टी का बस नहीं | तो क्यूँ हमनें अपनी ही सोच को इतना छोटा कर लिया है, कि समाज को बाँटने वाले विषयों से जुड़ी घटनाओं को हम अत्यधिक तव्वजों देकर उस पर हो हल्ला करने लगतें हैं, लेकिन बेरोजगारी, महँगाई, ग़रीबी और बलात्कार जैसी चीज़ों की खिलाफ़त करने के लिए उतना हो हल्ला क्यूँ नहीं, क्या इन विषयों को आपने समाज का एक हिस्सा ही मान लिया है, या इनके साथ आपने समायोजन की आदत डाल ली है |

जनाब! मेरा सिर्फ इतना ही कहना है, राजनीतिक पार्टियों से ज्यादा हमें अपनी सोच पर विचार करने और उसको बदलने की जरूरत है, देश को बाँटने वालों मुद्दों की बजाए , इसको संजोय रखने वाले मुद्दों की ओर ध्यान देने का वक़्त आ गया है |

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